CorruptionCase – 10 लाख रिश्वत प्रकरण में सीबीआई का बड़ा खुलासा
CorruptionCase – लखनऊ में दस लाख रुपये की कथित रिश्वत के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो की कार्रवाई ने एक संगठित नेटवर्क की परतें खोल दी हैं। जांच में सामने आया है कि वाटर एंड पावर कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड (वापकोस) से जुड़े कुछ अधिकारी टेंडर से जुड़ी गोपनीय जानकारियां बाहर पहुंचा रहे थे। ये सूचनाएं सीधे कंपनियों तक नहीं जाती थीं, बल्कि बिचौलियों के जरिए तय सौदे के बाद साझा की जाती थीं। आरोप है कि इस तरह पूरी प्रक्रिया को महज औपचारिकता बना दिया जाता था और ठेका पहले से तय कंपनी को दिलाया जाता था।

गिरफ्तारियां और शुरुआती कार्रवाई
शनिवार को सीबीआई ने इस मामले में वापकोस के प्रोजेक्ट मैनेजर पंकज दुबे, इकाना इंटरप्राइज के मालिक बबलू सिंह यादव, कथित बिचौलिया राहुल वर्मा, एक अन्य सहयोगी और पंकज दुबे के चालक शुभम पाल को हिरासत में लिया। जांच एजेंसी का दावा है कि ये सभी एक सुनियोजित तरीके से काम कर रहे थे। प्राथमिकी में गोपाल मिश्रा नामक व्यक्ति का भी उल्लेख है, जिसे नेटवर्क का अहम कड़ी माना जा रहा है। एजेंसी अब इन सभी से पूछताछ कर यह समझने की कोशिश कर रही है कि यह सिलसिला कब से चल रहा था और कितनी परियोजनाएं इसकी चपेट में आईं।
कैसे संचालित होता था पूरा तंत्र
जांच में सामने आया कि उड़ीसा में इमली प्रसंस्करण इकाई के लिए लगभग 11.81 करोड़ रुपये के ठेके के एवज में रिश्वत की रकम किस्तों में पहुंचाई जा रही थी। आरोप है कि बिचौलियों के माध्यम से यह रकम संबंधित अधिकारी तक पहुंचती थी। गोपनीय टेंडर दस्तावेज पहले ही चुनिंदा लोगों को उपलब्ध करा दिए जाते थे। इससे इच्छुक कंपनी अपनी बोली उसी हिसाब से तैयार करती थी, जिससे उसे बढ़त मिल सके। कागजों में पूरी प्रक्रिया पारदर्शी दिखती थी, लेकिन असल में परिणाम पहले से तय होने का संदेह है।
बिचौलियों की भूमिका और सौदे की शर्तें
सीबीआई सूत्रों के अनुसार, गोपाल मिश्रा उन कंपनियों से संपर्क करता था जो टेंडर में भाग लेना चाहती थीं। बताया जा रहा है कि जो कंपनियां अनुमानित लागत का छह से दस प्रतिशत तक अतिरिक्त राशि देने को तैयार होती थीं, उनके साथ सौदा पक्का किया जाता था। समझौते के बाद उन्हें तकनीकी और वित्तीय बिंदुओं से जुड़ी अहम जानकारियां दी जाती थीं। इसी आधार पर वे अपनी बोली तैयार करती थीं और प्रतिस्पर्धा में आगे निकल जाती थीं। इकाना इंटरप्राइज को मिला ठेका भी इसी पैटर्न पर होने की बात जांच में सामने आई है।
यूपी और दिल्ली में अलग जिम्मेदारी
जांच एजेंसी का कहना है कि नेटवर्क क्षेत्रवार बंटा हुआ था। गोपाल मिश्रा को उत्तर प्रदेश और दिल्ली की कंपनियों से संपर्क साधने की जिम्मेदारी दी गई थी। इन दोनों राज्यों में संभावित ठेकेदारों से बातचीत और शर्तों पर सहमति बनाने का काम वही देखता था। अधिकारियों का मानना है कि यह व्यवस्था लंबे समय से सक्रिय थी और करोड़ों रुपये के लेनदेन की आशंका है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष विस्तृत वित्तीय जांच के बाद ही सामने आएगा।
रिश्वत की रकम का बंटवारा
मामले में पंकज दुबे के अलावा भबद्युत्ती भूटिया और अभिषेक ठाकुर को भी आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि प्राप्त रकम को बराबर हिस्सों में बांटा जाता था। हालांकि कुछ मामलों में मुख्य भूमिका निभाने वाले अधिकारी को अधिक हिस्सा मिलने की भी बात सामने आई है। विभागीय जिम्मेदारियों के कारण अधिकांश डील सीधे उसी के माध्यम से तय होती थीं। बड़ी रकम के प्रवाह को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय की संभावित एंट्री से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। फिलहाल सीबीआई दस्तावेजों, बैंक खातों और डिजिटल साक्ष्यों की जांच में जुटी है ताकि पूरे नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर सामने लाई जा सके।



