ConsultancyPolicy – लखनऊ विश्वविद्यालय में नई नीति लागू, शोध और उद्योग को बढ़ावा
ConsultancyPolicy – लखनऊ विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक और शोध कार्यों को नई दिशा देने के उद्देश्य से कंसल्टेंसी पॉलिसी 2026 लागू कर दी है। इस नई व्यवस्था को 28 मार्च को विद्या परिषद की स्वीकृति मिलने के बाद प्रभावी किया गया, जिसके साथ ही वर्ष 2020 की पुरानी नीति समाप्त हो गई। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि इस कदम से शिक्षकों की विशेषज्ञता का उपयोग व्यापक स्तर पर हो सकेगा और संस्थान की भूमिका केवल शिक्षण तक सीमित नहीं रहेगी।

सभी संकायों को कंसल्टेंसी में भागीदारी का अवसर
नई नीति के तहत विश्वविद्यालय के लगभग सभी संकायों को शामिल किया गया है। इसमें इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विज्ञान, कृषि, योग, कला, वाणिज्य, विधि, ललित कला, शिक्षा और अभिनवगुप्त संकाय के शिक्षक भी परामर्श कार्यों में हिस्सा ले सकेंगे। इस पहल का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद विशेषज्ञता को उद्योगों, सरकारी संस्थाओं और अन्य संगठनों तक पहुंचाना है। इससे विश्वविद्यालय और समाज के बीच सहयोग का दायरा बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
शिक्षकों और तकनीकी कर्मचारियों की भूमिका तय
नीति के अनुसार नियमित और स्व-वित्त पोषित पाठ्यक्रमों से जुड़े शिक्षक कंसल्टेंसी कार्यों में शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा, पीएचडी डिग्री प्राप्त तकनीकी कर्मचारियों को सह-अन्वेषक के रूप में जोड़ा जाएगा, जिससे शोध और परामर्श कार्यों की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सके। विश्वविद्यालय का प्रयास है कि अकादमिक ज्ञान को व्यावहारिक जरूरतों से जोड़ा जाए, ताकि इसका सीधा लाभ समाज और उद्योग दोनों को मिले।
कंसल्टेंसी प्रबंधन के लिए समिति का गठन
इस पूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित तरीके से संचालित करने के लिए कुलपति की अध्यक्षता में कंसल्टेंसी प्रबंधन समिति गठित की गई है। यह समिति प्रस्तावों की समीक्षा, अनुमोदन और कार्यान्वयन की निगरानी करेगी। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी कंसल्टेंसी कार्य निर्धारित मानकों और पारदर्शिता के साथ पूरे हों।
राजस्व साझाकरण का स्पष्ट ढांचा
नई नीति में आय के बंटवारे को भी स्पष्ट किया गया है। विज्ञान और इंजीनियरिंग संकायों में कंसल्टेंसी से प्राप्त आय का 60 प्रतिशत हिस्सा शिक्षकों को मिलेगा, जबकि 40 प्रतिशत विश्वविद्यालय के खाते में जाएगा। वहीं अन्य संकायों के लिए यह अनुपात अलग रखा गया है, जहां शिक्षकों को 70 प्रतिशत और विश्वविद्यालय को 30 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। इस व्यवस्था से शिक्षकों को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है, साथ ही विश्वविद्यालय को अतिरिक्त आर्थिक संसाधन भी प्राप्त होंगे।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया अहम कदम
कुलपति प्रोफेसर जेपी सैनी ने इस नीति को संस्थान के लिए महत्वपूर्ण पहल बताया है। उनके अनुसार, यह बदलाव न केवल शोध और नवाचार को बढ़ावा देगा, बल्कि विश्वविद्यालय को प्रदेश के विकास में एक सक्रिय ज्ञान सहयोगी के रूप में स्थापित करेगा। इससे अकादमिक जगत और व्यावहारिक क्षेत्रों के बीच की दूरी कम होने की संभावना भी जताई गई है।



