Congress Leader Praveen Chakravarty Comment: अपनों के वार से कांग्रेस हुई घायल, प्रवीण चक्रवर्ती की टिप्पणी ने पैदा की सियासी गर्मी
Congress Leader Praveen Chakravarty Comment: भारतीय राजनीति में इन दिनों कांग्रेस पार्टी अपने ही नेताओं के विरोधाभासी बयानों के चलते रक्षात्मक मुद्रा में खड़ी नजर आ रही है। अभी पार्टी दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा से पैदा हुए (Internal Party Conflict) की स्थिति से उबर भी नहीं पाई थी कि डेटा एनालिटिक्स विभाग के अध्यक्ष प्रवीण चक्रवर्ती ने एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की आर्थिक स्थिति की तुलना तमिलनाडु से करते हुए योगी सरकार के वित्तीय प्रबंधन को बेहतर बता दिया है, जिससे न केवल पार्टी के भीतर बल्कि गठबंधन सहयोगियों के बीच भी हड़कंप मच गया है।

उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के कर्ज की चौंकाने वाली तुलना
Praveen Chakravarty ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि कर्ज के बढ़ते बोझ के मामले में तमिलनाडु की स्थिति अब उत्तर प्रदेश से कहीं अधिक चिंताजनक हो गई है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि (State Debt Statistics India) के अनुसार तमिलनाडु पर बकाया कर्ज अब यूपी के मुकाबले ज्यादा है। चक्रवर्ती का यह कहना कि विकास के दावों के बीच तमिलनाडु का वित्तीय स्वास्थ्य “खतरनाक” मोड़ पर है, सीधे तौर पर सत्तारूढ़ डीएमके सरकार की आर्थिक नीतियों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
सोशल मीडिया पर छिड़ा डेटा का युद्ध
प्रवीण चक्रवर्ती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए तमिलनाडु के बढ़ते ब्याज के बोझ पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने तर्क दिया कि (Debt to GDP Ratio Analysis) के मामले में तमिलनाडु अभी भी कोविड-19 से पहले के स्तर पर वापस नहीं लौट पाया है। दिलचस्प बात यह है कि यह टिप्पणी डीएमके नेता कनिमोझी के उस बयान के पलटवार के रूप में आई, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उनकी पार्टी ने तमिलनाडु को कर्ज के जाल से निकालकर एक विकसित राज्य बनाया है।
इंडिया गठबंधन की एकजुटता पर मंडराते बादल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस नेता का यह बयान ‘इंडिया’ ब्लॉक के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस (India Alliance Stability) के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते हैं, लेकिन एक सहयोगी दल के नेता द्वारा राज्य सरकार की बखिया उधेड़ना गठबंधन की दरार को उजागर करता है। टीवीके नेता आधव अर्जुन के हालिया बयानों के बाद जब राज्य में नए समीकरणों की चर्चा तेज थी, तब चक्रवर्ती की इस टिप्पणी ने आग में घी डालने का काम किया है।
डीएमके का तीखा पलटवार और आरोपों का खंडन
डीएमके नेता एमएम अब्दुल्ला ने प्रवीण चक्रवर्ती के दावों को सिरे से खारिज करते हुए उन पर जनता के बीच डर फैलाने का आरोप लगाया है। अब्दुल्ला का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा लिया गया कर्ज केवल (Capital Expenditure in Tamil Nadu) और परिसंपत्ति निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछले पांच वर्षों में तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था में 39 प्रतिशत की शानदार वृद्धि हुई है और यह अब 17.3 लाख करोड़ रुपये की विशाल अर्थव्यवस्था बन चुकी है, जिसे यूपी जैसे राज्यों से तुलना करना गलत है।
कांग्रेस के भीतर ही उठने लगी विरोध की आवाजें
प्रवीण चक्रवर्ती के इस विश्लेषण से कांग्रेस पार्टी के अन्य नेता भी सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। कांग्रेस सांसद जोशिमणि ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि तमिलनाडु जैसे प्रगतिशील राज्य की तुलना उत्तर प्रदेश से करना तार्किक रूप से सही नहीं है। पार्टी के भीतर इस (Political Crisis in Congress) को लेकर चिंता जताई जा रही है कि चुनाव के समय ऐसे बयान बीजेपी को बैठे-बिठाए मुद्दा थमा देते हैं और गठबंधन सहयोगियों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा कर देते हैं।
बीजेपी ने लपका मौका और कांग्रेस को घेरा
प्रवीण चक्रवर्ती के बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने इसे हाथों-हाथ लिया और डीएमके सरकार पर निशाना साधा। तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने चक्रवर्ती का समर्थन करते हुए कहा कि डीएमके हमेशा से (Manipulated Economic Data) पेश करती रही है। अन्नामलाई ने दावा किया कि स्टालिन सरकार के कार्यकाल में राज्य का कर्ज दोगुना हो गया है। साथ ही उन्होंने यह भी चुटकी ली कि क्या यह बयान इस बात का सबूत है कि कांग्रेस अब इंडिया गठबंधन के भीतर घुटन महसूस कर रही है।
भविष्य की राजनीति पर बयान का गहरा असर
प्रवीण चक्रवर्ती की इस टिप्पणी ने न केवल तमिलनाडु की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की राजनीति को प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश की (Better Debt Management) की प्रशंसा करना कांग्रेस की उस रणनीति के खिलाफ जाता है जिसमें वह लगातार योगी सरकार को विफल दिखाने की कोशिश करती है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस स्थिति को कैसे संभालता है और क्या यह विवाद आने वाले विधानसभा चुनावों या गठबंधन की सीटों के तालमेल पर कोई नकारात्मक प्रभाव डालता है।



