ChildSafety – पीडोफीलिया पर विशेषज्ञों की गंभीर चेतावनी
ChildSafety – बांदा में बच्चों के यौन शोषण के मामले में एक दंपती को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद ‘पीडोफीलिया’ शब्द फिर चर्चा में है। यह शब्द आम लोगों के लिए भले नया लगे, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह एक गंभीर मनोवैज्ञानिक विकार है, जिसमें वयस्क व्यक्ति बच्चों के प्रति असामान्य यौन आकर्षण महसूस करता है। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मामलों को केवल अपराध की नजर से ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में भी समझना जरूरी है, ताकि रोकथाम और उपचार दोनों संभव हो सकें।

पीडोफीलिया क्या है और क्यों है खतरनाक
मनोचिकित्सकों के मुताबिक पीडोफीलिया असामान्य यौन प्रवृत्तियों की श्रेणी में आता है। इस स्थिति से जूझ रहे लोग अक्सर अपने व्यवहार को छिपाने की कोशिश करते हैं और बच्चों के करीब आने के अवसर तलाशते हैं। समस्या यह है कि ऐसे व्यक्तियों की पहचान करना आसान नहीं होता। वे सामान्य व्यवहार का आभास देते हैं, जिससे परिवार या समाज को संदेह नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रवृत्ति अगर नियंत्रित न की जाए तो बच्चों के शोषण जैसी गंभीर घटनाओं का कारण बन सकती है।
बच्चों से संवाद और सतर्कता की जरूरत
किंग जॉर्ज मेडिकल विश्वविद्यालय के मानसिक रोग विभाग से जुड़े चिकित्सकों का मानना है कि बच्चों के साथ खुला संवाद सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की दिनचर्या, उनके व्यवहार और उनके मित्र मंडली पर ध्यान दें। यदि बच्चा अचानक चुप रहने लगे, असहज दिखे या किसी विशेष व्यक्ति से मिलने में झिझक दिखाए, तो उसे हल्के में न लें। बच्चों को यह भरोसा दिलाना भी जरूरी है कि वे किसी भी असहज अनुभव के बारे में बिना डर अपनी बात कह सकते हैं।
चिकित्सीय परामर्श से संभव उपचार
विशेषज्ञों का कहना है कि हर मामला आपराधिक मानसिकता का नहीं होता। कई बार असामान्य यौन इच्छा से परेशान लोग स्वयं उपचार के लिए आते हैं। कुछ मामलों में परिवार के सदस्य भी उन्हें डॉक्टर के पास लेकर पहुंचते हैं। दवाओं, व्यवहारिक थेरेपी और नियमित काउंसलिंग के जरिए इस विकार को नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टरों के अनुसार समय पर हस्तक्षेप होने से संभावित अपराधों को रोका जा सकता है।
पीड़ित बच्चों के पुनर्वास की चुनौती
बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यौन शोषण का असर बच्चे के मन पर लंबे समय तक रहता है। कई बार यह प्रभाव वयस्क होने तक बना रहता है। ऐसे बच्चों में डर, अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं देखी जाती हैं। इसलिए केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। प्रभावित बच्चों को पेशेवर काउंसलिंग, भावनात्मक समर्थन और सुरक्षित वातावरण देना बेहद जरूरी है। चिकित्सा संस्थानों में इसके लिए विशेष सेवाएं उपलब्ध हैं, जहां प्रशिक्षित विशेषज्ञ बच्चों की मदद करते हैं।
अभिभावकों के लिए सावधानियां
विशेषज्ञ कुछ बुनियादी सावधानियों पर जोर देते हैं। बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में उम्र के अनुसार जानकारी दी जानी चाहिए। उन्हें सिखाया जाए कि यदि कोई व्यक्ति उन्हें असहज महसूस कराए तो तुरंत मना करें और घरवालों को बताएं। बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना भी जरूरी है, क्योंकि डिजिटल माध्यमों से भी शोषण के मामले सामने आते हैं। स्कूलों और संस्थानों में कर्मचारियों की पृष्ठभूमि की जांच और नियमित निगरानी भी सुरक्षा का अहम हिस्सा है।
संभावित संकेतों को पहचानना जरूरी
अगर बच्चा अचानक चिड़चिड़ा हो जाए, सामान्य से अधिक चुप या अत्यधिक बोलने लगे, पुराने दोस्तों से दूरी बना ले या बिना स्पष्ट कारण सिरदर्द, नींद की कमी और डरावने सपनों की शिकायत करे, तो यह संकेत हो सकते हैं कि वह किसी मानसिक दबाव में है। ऐसे समय में डांटने के बजाय संवेदनशीलता से बात करना ज्यादा कारगर होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, संवाद और समय पर चिकित्सा सहायता ही बच्चों की सुरक्षा की मजबूत नींव है।



