TenderControversy – मुख्यमंत्री परिवार को मिले ठेकों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
TenderControversy – अरुणाचल प्रदेश में सरकारी ठेकों के आवंटन को लेकर उठे विवाद ने अब न्यायिक मोड़ ले लिया है। मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिवार से जुड़ी कंपनियों को पिछले एक दशक में दिए गए कथित ठेकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। याचिकाओं में दावा किया गया है कि इन कंपनियों को लगभग 1,270 करोड़ रुपये के सरकारी कॉन्ट्रैक्ट मिले, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस मामले ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर ध्यान केंद्रित कर दिया है।

ठेकों के आवंटन पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जिन कंपनियों को ये ठेके दिए गए, उनका सीधा संबंध मुख्यमंत्री के परिवार से है, जिससे हितों के टकराव की स्थिति बनती है। इस मामले को लेकर कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि सरकारी संसाधनों के आवंटन में पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इस मामले में कई पहलुओं पर संदेह पैदा होता है। उन्होंने अदालत को बताया कि पिछले 10 वर्षों में चार कंपनियों को लगातार बड़े प्रोजेक्ट दिए गए, जो जांच की मांग करते हैं।
कौन-कौन हैं मामले में शामिल
इस याचिका में मुख्यमंत्री पेमा खांडू के अलावा उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी पक्षकार बनाया गया है। इसमें उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की दूसरी पत्नी रिंचिन ड्रिमा और भतीजे त्सेरिंग ताशी का नाम शामिल है। दोरजी खांडू का 2011 में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हो गया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि परिवार से जुड़े इन लोगों की कंपनियों को सरकारी परियोजनाओं में प्राथमिकता दी गई।
कंपनियों को मिले ठेकों पर विवाद
याचिका में विशेष रूप से रिंचिन ड्रिमा की कंपनी ब्रांड ईगल्स का उल्लेख किया गया है, जिसे कई सरकारी परियोजनाओं में ठेके मिलने की बात कही गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इन ठेकों के आवंटन की प्रक्रिया में निष्पक्षता की कमी रही और पारिवारिक संबंधों के चलते लाभ पहुंचाया गया। हालांकि, इस मामले में अभी तक संबंधित पक्षों की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
न्यायिक हस्तक्षेप से बढ़ी उम्मीदें
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में संज्ञान लेने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो सकेगी। अदालत की निगरानी में जांच होने से सरकारी ठेकों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। यह मामला केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स के आवंटन में पारदर्शिता के व्यापक सवाल को भी सामने लाता है।
प्रशासनिक पारदर्शिता पर फोकस
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि क्या सरकारी ठेकों के आवंटन में पर्याप्त निगरानी और स्पष्ट नियमों का पालन हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्वतंत्र जांच और मजबूत नीतियां जरूरी हैं, ताकि किसी भी तरह के हितों के टकराव से बचा जा सके। आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई और उससे जुड़े फैसले राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर असर डाल सकते हैं।



