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SupremeCourt – कोर्ट ने लंबे समय तक काम करने वालों को स्थायी मानने का दिए निर्देश

SupremeCourt – उच्चतम न्यायालय ने कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति से कई वर्षों तक लगातार काम लिया जाता है, तो उसे अस्थायी नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबी अवधि तक सेवा देना इस बात का संकेत है कि संबंधित पद की प्रकृति स्थायी थी और वहां नियमित नियुक्ति की आवश्यकता थी। यह निर्णय कानपुर नगर निगम से जुड़े स्विचमैन कर्मचारियों के मामले में आया है।

लंबी सेवा को स्थायित्व का आधार माना गया

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि 12 से 13 वर्षों तक लगातार काम करने वाले कर्मचारियों को अस्थायी बताना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि इतनी लंबी अवधि तक सेवा लेने के बाद अचानक नौकरी से हटाना न्यायसंगत नहीं है। इस टिप्पणी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया और प्रभावित कर्मचारियों की बहाली का आदेश दिया।

दस्तावेज पेश न करने पर संस्था पर सवाल

सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि नगर निगम कर्मचारियों की उपस्थिति से जुड़े रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका। इस पर अदालत ने श्रम न्यायालय के निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि यदि कोई संस्था आदेश के बावजूद जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करती, तो इसका नकारात्मक असर उसी पर पड़ता है। कानून में इसे प्रतिकूल अनुमान के रूप में देखा जाता है, जहां रिकॉर्ड न देना संस्था की कमजोरी माना जाता है।

बहाली का आदेश, वेतन पर अलग विचार

सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों को पुनः सेवा में लेने का निर्देश दिया है। हालांकि, उनके बकाया वेतन को लेकर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। अदालत ने इस मुद्दे पर यह जांच जरूरी बताई है कि नौकरी से हटाए जाने के बाद संबंधित कर्मचारी कहीं और कार्यरत थे या नहीं। इस बिंदु पर विचार के लिए मामला फिर से उच्च न्यायालय को भेजा गया है।

देशभर के कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण संकेत

इस फैसले को संविदा और अस्थायी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय तक काम करने वाले कर्मचारियों को स्थायित्व से जुड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। इससे ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ है, जहां कर्मचारी वर्षों तक सेवा देने के बावजूद अस्थायी श्रेणी में रखे जाते हैं।

भूमि विवादों के समाधान पर नई बहस

इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दाखिल की गई है, जिसमें भूमि विवादों के निपटारे के लिए अलग राजस्व न्यायिक सेवा स्थापित करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में कई ऐसे अधिकारी इन मामलों का फैसला कर रहे हैं, जिनके पास विधिक प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं है। इससे निर्णयों में असंगति और त्रुटियां देखने को मिलती हैं।

न्यायिक प्रशिक्षण की जरूरत पर जोर

याचिका में सुझाव दिया गया है कि भूमि और संपत्ति से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अधिकारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता तय की जाए। साथ ही उनके लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल भी बनाया जाए, ताकि फैसले अधिक सुसंगत और न्यायसंगत हो सकें। इस मामले में जल्द सुनवाई होने की संभावना है।

संपत्ति अधिकारों पर असर की चिंता

याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के कारण संपत्ति से जुड़े मामलों में अनिश्चितता बनी रहती है। इससे न केवल मुकदमों की संख्या बढ़ती है, बल्कि नागरिकों को आर्थिक और मानसिक रूप से भी नुकसान उठाना पड़ता है। याचिका में इसे संविधान के तहत मिले अधिकारों से भी जोड़ा गया है और सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

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