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Supreme Court Stay on Aravalli Definition: अरावली के अस्तित्व पर मंडराते खतरे के बीच सुप्रीम कोर्ट ने किया ऐतिहासिक हस्तक्षेप

Supreme Court Stay on Aravalli Definition: देश की पारिस्थितिक तंत्र के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला एक सुरक्षा कवच की तरह है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली न मानने वाले आदेश पर रोक लगा दी है। अदालत ने इस गंभीर (Environmental Protection) विषय पर खुद संज्ञान लिया है ताकि पर्यावरण के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न हो सके। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि इस मुद्दे को लेकर समाज में कई गलत जानकारियां प्रसारित की जा रही हैं, जिस पर कोर्ट ने स्पष्टता की आवश्यकता जताई है।

Supreme Court Stay on Aravalli Definition
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पहाड़ की परिभाषा और अनियंत्रित खनन का डर

अरावली को लेकर सबसे बड़ा विवाद इसकी ऊंचाई को लेकर उपजा था। पिछले आदेशों में यह संकेत दिया गया था कि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा (Mining Regulations) नहीं माना जाएगा। यदि ऐसा होता, तो अरावली के एक बहुत बड़े हिस्से में खनन गतिविधियों को मंजूरी मिल जाती। कोर्ट ने अब साफ कर दिया है कि अरावली की संरचनात्मक और पारिस्थितिक अखंडता को बचाने के लिए हर तकनीकी बिंदु की गहराई से जांच करना अनिवार्य है।

उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का होगा गठन

सुप्रीम कोर्ट ने इस जटिल मामले को सुलझाने के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी बनाने का निर्देश दिया है। इस समिति में डोमेन एक्सपर्ट्स शामिल होंगे जो अरावली हिल्स और रेंज की (Ecological Integrity) विस्तृत जांच करेंगे। चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया है कि जब तक यह समिति अपनी रिपोर्ट पेश नहीं करती और कोर्ट किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुँचता, तब तक पुराने फैसलों के क्रियान्वयन पर रोक रहेगी। यह कदम अरावली के मूल स्वरूप को बचाए रखने के लिए उठाया गया है।

हिमालय से भी पुरानी श्रृंखला पर संकट के बादल

अरावली पर्वत श्रृंखला भले ही हिमालय की तरह ऊंची न हो, लेकिन इसका महत्व किसी भी अन्य पर्वत से कम नहीं है। यह श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली (Wildlife Habitat) तक फैली हुई है। इस क्षेत्र में जैव विविधता का भंडार है, जहाँ दुर्लभ वन्य जीव और वनस्पतियां पाई जाती हैं। अगर खनन को अनियंत्रित रूप से अनुमति दी जाती है, तो यहाँ का पूरा ईको-सिस्टम तबाह होने का खतरा पैदा हो सकता है, जिसे ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने चार राज्यों को नोटिस जारी किया है।

केंद्र और चार राज्यों से माँगा गया जवाब

अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार के साथ-साथ राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा सरकार को नोटिस जारी किया है। इन राज्यों से अरावली के संरक्षण (Biodiversity Conservation) और खनन नीतियों पर जवाब मांगा गया है। अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान और हरियाणा में आता है, जहाँ पिछले कुछ वर्षों में अवैध खनन की खबरें लगातार आती रही हैं। अब इन सरकारों को अदालत के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

21 जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी नजरें

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी की तारीख तय की है। तब तक के लिए केंद्र सरकार की उस परिभाषा पर रोक लगा दी गई है, जिसमें 100 मीटर से कम की पहाड़ियों को अरावली के दायरे से बाहर रखने की (Legal Intervention) बात कही गई थी। कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रकृति प्रेमियों और पर्यावरणविदों ने कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है।

पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती

अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं है, बल्कि यह थार मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकने वाली एक प्राकृतिक दीवार है। यदि इन पहाड़ियों को (Natural Resources) नष्ट किया गया, तो उत्तर भारत के बड़े हिस्से में मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ जाएगा। कोर्ट ने इसी दूरगामी खतरे को भांपते हुए विशेषज्ञ समिति के माध्यम से वैज्ञानिक तथ्यों को खंगालने का निर्णय लिया है ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।

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