Supreme Court Judicial Independence: न्यायिक आदेशों के लिए जज की बर्खास्तगी गलत, सुनाया ये बड़ा फरमान
Supreme Court Judicial Independence: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक जिला जज की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि केवल (Judicial Orders) की त्रुटि के आधार पर किसी न्यायाधीश के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने माना कि न्यायिक प्रक्रिया में फैसलों का गलत होना संभव है, लेकिन उसे भ्रष्टाचार या कदाचार का नाम देना गलत है।

क्या था पूरा मामला?
यह मामला 2014 का है, जब निर्भय सिंह सुलिया मध्य प्रदेश में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे। उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने (Bail Applications) पर निर्णय लेते समय ‘दोहरा मापदंड’ अपनाया। प्रशासन का मानना था कि उनके आदेशों में विसंगतियां थीं, जिसके कारण उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। सुलिया ने इस अन्याय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ अंततः उन्हें न्याय मिला।
गलती और भ्रष्टाचार के बीच की लकीर
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि एक जज के रूप में सेवा करते समय कई बार निर्णय लेने में त्रुटि हो सकती है। यदि हर गलत आदेश को (Professional Misconduct) माना जाने लगा, तो न्यायाधीश स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाएंगे। कोर्ट ने जोर दिया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही तभी शुरू की जानी चाहिए जब भ्रष्टाचार या अनुचित लाभ लेने के पुख्ता सबूत हों। केवल आदेश की गुणवत्ता के आधार पर नौकरी से निकालना न्यायसंगत नहीं है।
आगामी महत्वपूर्ण सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट न केवल जजों के अधिकारों की रक्षा कर रहा है, बल्कि अन्य संवेदनशील मुद्दों पर भी सक्रिय है। आने वाले समय में कोर्ट एक (Social Media Influencer) की जमानत याचिका पर सुनवाई करेगा, जो मानव तस्करी जैसे गंभीर आरोपों में घिरी है। इसके अतिरिक्त, दिल्ली के रिज क्षेत्र में अवैध रूप से पेड़ों की कटाई को लेकर दायर याचिकाओं पर भी शीर्ष अदालत अपना रुख स्पष्ट करेगी, जो पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।



