Self Driving Cars: सेल्फ ड्राइविंग कारों के दौर में ट्रैफिक सिग्नल में जुड़ सकती है चौथी लाइट
Self Driving Cars: हम अक्सर हॉलीवुड फिल्मों में बिना ड्राइवर के अपने आप चलने वाली कारों को सड़कों पर फर्राटा भरते देखते रहे हैं, लेकिन अब यह कल्पना हकीकत में बदल चुकी है। अमेरिका में Waymo जैसी कंपनियां Autonomous Vehicles को आम सड़कों पर उतार चुकी हैं। ऐसे में दुनिया भर के वैज्ञानिक और ट्रैफिक एक्सपर्ट यह सोचने पर मजबूर हैं कि क्या मौजूदा सड़कें और ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम इन नई तकनीकों के लिए पर्याप्त हैं या फिर उनमें बदलाव की जरूरत पड़ेगी।

बदलते समय के साथ ट्रैफिक सिस्टम की चुनौती
आज पूरी दुनिया में ट्रैफिक कंट्रोल का आधार तीन रंगों वाली लाइट्स पर टिका है। लाल रुकने का संकेत देता है, पीला सावधान करता है और हरा चलने की अनुमति देता है। लेकिन जैसे-जैसे Self Driving Cars की संख्या बढ़ेगी, इंसानी ड्राइवर और मशीन के बीच तालमेल बनाना एक बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी समस्या के समाधान के रूप में वैज्ञानिकों ने ट्रैफिक सिग्नल में चौथी लाइट जोड़ने का प्रस्ताव रखा है।
क्या है यह नई सफेद लाइट
उत्तरी कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने वर्ष 2020 से एक नए ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम पर काम शुरू किया। इस रिसर्च में एक नई White Traffic Light का सुझाव दिया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब सड़कों पर पर्याप्त संख्या में Autonomous Vehicles मौजूद होंगी, तब यह सफेद लाइट सक्रिय होगी और ट्रैफिक को ज्यादा स्मार्ट तरीके से नियंत्रित किया जा सकेगा।
सफेद लाइट जलने पर क्या करना होगा
जब किसी चौराहे पर सफेद लाइट जलेगी, तो इंसानी ड्राइवरों के लिए नियम बेहद सरल होगा। उन्हें केवल अपनी आगे चल रही गाड़ी को फॉलो करना होगा। यदि आगे वाली कार चल रही है तो पीछे वाली चलेगी और यदि वह रुक रही है तो पीछे वाली भी रुक जाएगी। इस दौरान Self Driving Cars आपस में और Traffic Signal से वायरलेस तकनीक के जरिए संवाद करेंगी और पूरे चौराहे पर ट्रैफिक को संतुलित रखेंगी।
किन परिस्थितियों में सक्रिय होगी यह लाइट
सफेद लाइट हर समय नहीं जलेगी। यह केवल तभी चालू होगी जब सिस्टम को यह पता चलेगा कि चौराहे पर पर्याप्त संख्या में Autonomous Vehicles मौजूद हैं। यदि यह संख्या कम होगी, तो सामान्य रेड और ग्रीन लाइट का सिस्टम पहले की तरह ही लागू रहेगा। इस तरह पुराने और नए सिस्टम के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जाएगी।
भारत जैसे देश के लिए क्या है इसका महत्व
भारत में ट्रैफिक जाम एक आम समस्या है। बार-बार ब्रेक और क्लच दबाने से न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि Fuel Consumption भी काफी बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि White Phase Traffic System भारत जैसे देशों के लिए वरदान साबित हो सकता है। जब गाड़ियां बिना बार-बार रुके सुचारू रूप से आगे बढ़ेंगी, तो ईंधन की खपत कम होगी और प्रदूषण पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा।
शोध में सामने आए अहम आंकड़े
रिसर्च के दौरान किए गए Simulation से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। यदि सड़क पर कुल वाहनों में से केवल 10 प्रतिशत भी Self Driving Cars हों, तो ट्रैफिक में देरी करीब 3 प्रतिशत तक कम हो सकती है। वहीं यदि यह संख्या 30 प्रतिशत तक पहुंच जाए, तो ट्रैफिक जाम में देरी 10.7 प्रतिशत तक घट सकती है। यह संकेत देता है कि कम संख्या में भी Autonomous Vehicles पूरे सिस्टम को बेहतर बना सकती हैं।
भारत में लागू करने की राह में बाधाएं
हालांकि यह तकनीक भविष्य के लिए बेहद आकर्षक है, लेकिन भारत में इसे लागू करना आसान नहीं होगा। देश के हजारों चौराहों पर मौजूदा ट्रैफिक लाइट्स को Smart Traffic Signal में बदलना एक महंगा और समय लेने वाला काम है। इसके अलावा भारतीय ड्राइवरों को नए नियमों के अनुसार प्रशिक्षित करना भी बड़ी चुनौती होगी।
व्यवहारिक और तकनीकी चुनौतियां
भारत में अक्सर लोग पीली बत्ती पर भी तेजी से निकलने की कोशिश करते हैं। ऐसे में केवल आगे वाली गाड़ी को फॉलो करने का नियम अव्यवस्था भी पैदा कर सकता है। इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना कि अलग-अलग कंपनियों की Autonomous Vehicles एक ही Communication Protocol में ट्रैफिक सिग्नल से बात करें, एक बड़ी तकनीकी चुनौती होगी।
भविष्य की तस्वीर
विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल यह सिस्टम प्रयोग के स्तर पर है, लेकिन आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे Self Driving Technology का विस्तार होगा, ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम में बदलाव अपरिहार्य हो जाएगा। सफेद लाइट का यह विचार आने वाले समय में स्मार्ट शहरों की नींव बन सकता है



