Republic Day Guest: जब पाकिस्तान के नेता बने भारत के गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि, जानें इतिहास…
Republic Day Guest: भारत और पाकिस्तान के बीच आज भले ही कूटनीतिक दूरियां हों, लेकिन इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे अध्याय दर्ज हैं जो बेहद चौंकाने वाले हैं। भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव यानी गणतंत्र दिवस के अवसर पर अब तक दो बार पाकिस्तान के प्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया है। यह वह दौर था जब विभाजन के जख्मों को भरने और शांति की नई राह खोजने के लिए (Diplomatic Relationship Building) के प्रयास जोरों पर थे। 1955 में पहली बार पाकिस्तान के गवर्नर जनरल को दिल्ली की परेड में शामिल होने का न्योता दिया गया था।

राजपथ पर पहली परेड और मलिक गुलाम मुहम्मद का आगमन
साल 1955 का गणतंत्र दिवस कई मायनों में ऐतिहासिक (Republic Day Guest) था, क्योंकि इसी वर्ष परेड को स्थायी रूप से राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर आयोजित करना शुरू किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर विवाद और विभाजन की कड़वाहट को कम करने के उद्देश्य से पाकिस्तान के गवर्नर जनरल सर मलिक गुलाम मुहम्मद को आमंत्रित किया था। उस समय भारत सरकार को उम्मीद थी कि इस (International Peace Initiative) के माध्यम से दोनों पड़ोसी देशों के बीच सैन्य तनाव को कम किया जा सकेगा और भविष्य के लिए सुलह का एक नया मंच तैयार होगा।
सर मलिक गुलाम मुहम्मद का राजनीतिक कद और विवाद
मलिक गुलाम मुहम्मद केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वह पूर्व भारतीय सिविल सेवा के एक कुशल अधिकारी भी रह चुके थे। साल 1946 में ब्रिटिश शासन द्वारा उन्हें नाइट की उपाधि से नवाजा गया था। हालांकि पाकिस्तान की राजनीति में उनकी भूमिका काफी विवादास्पद रही, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री ख्वाजा नाजिमुद्दीन की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया था। इसके बावजूद भारत ने उन्हें (Bilateral Cooperation Protocol) के तहत सम्मान दिया, क्योंकि नेहरू का मानना था कि व्यक्तिगत विचारधारा से ऊपर उठकर राष्ट्रों के बीच संबंधों को सुधारना प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए।
1965 में राणा अब्दुल हमीद की परेड में शिरकत
गुलाम मुहम्मद के ठीक दस साल बाद, जनवरी 1965 में पाकिस्तान के खाद्य एवं कृषि मंत्री राणा अब्दुल हमीद भारत के दूसरे पाकिस्तानी मुख्य अतिथि बने। लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व काल में दिए गए इस निमंत्रण के पीछे की वजह राणा परिवार की ऐतिहासिक जड़ें थीं। वह सिंध के एक प्रभावशाली परिवार से ताल्लुक रखते थे, जिनका नाता हिंदू सोडा राजपूतों से था। भारत ने इसे एक (Cross Border Harmony) का जरिया माना था, जिससे कृषि और व्यापारिक संबंधों को मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी।
निमंत्रण के कुछ महीनों बाद ही शुरू हुई घुसपैठ
दुर्भाग्यवश, शांति की यह कोशिशें ज्यादा समय तक टिक नहीं सकीं। राणा अब्दुल हमीद के भारत दौरे के महज तीन महीने बाद ही पाकिस्तान ने अप्रैल 1965 में ‘ऑपरेशन डेजर्ट हॉक’ के जरिए रण ऑफ कच्छ में घुसपैठ शुरू कर दी। भारत की उदारता के बदले पाकिस्तान की ओर से किए गए इस (Territorial Integrity Violation) ने नेहरू और शास्त्री की शांति नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद अगस्त में ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के जरिए कश्मीर में आतंकियों को भेजने की कोशिश की गई, जिसके परिणामस्वरूप सितंबर 1965 में दोनों देशों के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ गया।
भारत में निमंत्रण को लेकर छिड़ी तीखी बहस
पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर भारत के राजनीतिक गलियारों में उस समय भी भारी असंतोष देखने को मिला था। कांग्रेस नेता बी.जी. खेर ने जहां इसे बातचीत का एक नरम पुल बताया, वहीं चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने आगाह किया था कि पाकिस्तान पर अत्यधिक भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है। जनता के बीच भी (National Security Awareness) को लेकर काफी चिंताएं थीं। समाचार पत्रों ने इसे शिष्टाचार का हिस्सा तो माना, लेकिन सीमा पर हो रही गतिविधियों ने इन यात्राओं के महत्व को लगभग समाप्त कर दिया था।



