PolygraphTest – प्रदेश में जल्द शुरू होगी जांच की नई वैज्ञानिक व्यवस्था
PolygraphTest – प्रदेश में जटिल आपराधिक मामलों की जांच को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अब एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। फॉरेंसिक विभाग की ओर से लंबे समय से लंबित पॉलीग्राफ और नार्को टेस्ट की सुविधा स्थापित करने के प्रस्ताव पर आंशिक मंजूरी मिल गई है। फिलहाल सरकार ने पॉलीग्राफ टेस्ट की व्यवस्था शुरू करने के लिए सहमति दे दी है, जिससे जांच एजेंसियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

अब दूसरे राज्यों पर निर्भरता होगी कम
अब तक प्रदेश में इस तरह की वैज्ञानिक जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, जिसके चलते पुलिस को ऐसे मामलों में दिल्ली, चंडीगढ़ या हैदराबाद जैसी जगहों की लैब पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे जांच में देरी होती थी और कई बार प्रक्रिया जटिल हो जाती थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन चुनौतियों से काफी हद तक राहत मिलने की संभावना है।
कैसे काम करता है पॉलीग्राफ टेस्ट
पॉलीग्राफ टेस्ट को आम तौर पर ‘लाइ डिटेक्टर टेस्ट’ के रूप में जाना जाता है। इसमें आरोपी के शरीर पर विशेष सेंसर लगाए जाते हैं, जो उसकी शारीरिक प्रतिक्रियाओं जैसे दिल की धड़कन, रक्तचाप और पसीने के स्तर को रिकॉर्ड करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सच और झूठ बोलते समय इन संकेतों में बदलाव आता है, जिसके आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाती है। हालांकि, इसे अदालत में निर्णायक साक्ष्य के रूप में नहीं माना जाता, लेकिन जांच को दिशा देने में यह सहायक होता है।
नार्को टेस्ट को लेकर अभी मंजूरी लंबित
पॉलीग्राफ के साथ ही नार्को टेस्ट के लिए भी प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन इस पर अभी स्वीकृति नहीं मिली है। नार्को टेस्ट में आरोपी को एक विशेष दवा दी जाती है, जिससे वह अर्द्धचेतन अवस्था में पहुंच जाता है और उससे पूछताछ की जाती है। इस प्रक्रिया को लेकर पहले भी कई बार विवाद उठ चुके हैं, इसलिए इसे लेकर कानूनी और नैतिक पहलुओं पर अधिक सावधानी बरती जाती है।
पिछले मामलों में सामने आई थी जरूरत
कई चर्चित मामलों में इन जांच तकनीकों की आवश्यकता महसूस की गई थी। अंकिता भंडारी हत्याकांड में भी आरोपियों के पॉलीग्राफ और नार्को टेस्ट की अनुमति मांगी गई थी। शुरुआत में मुख्य आरोपी ने सहमति दी थी, लेकिन बाद में वह पीछे हट गया, जिसके चलते उच्च न्यायालय ने इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी।
पुराने मामलों में पॉलीग्राफ का इस्तेमाल
2008 के एक सामूहिक दुष्कर्म मामले में आरोपी का पॉलीग्राफ टेस्ट कराया गया था। इस मामले में बाद में आरोपी को अदालत द्वारा दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई। वहीं, 2017 में फैशन डिजाइनर आंचल पांधी की संदिग्ध मौत के मामले में भी पुलिस ने पॉलीग्राफ टेस्ट की अनुमति मांगी थी, लेकिन आरोपियों ने सहमति नहीं दी, जिससे यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
जल्द शुरू होगी प्रक्रिया, अधिकारियों का दावा
फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक डॉ. नीलेश आनंद भरणे के अनुसार, शासन से मंजूरी मिलने के बाद अब जल्द ही पॉलीग्राफ टेस्ट की सुविधा प्रदेश में ही शुरू करने की दिशा में काम किया जाएगा। इससे पुलिस को पेशेवर अपराधियों से पूछताछ में आसानी होगी और जांच की गति तेज हो सकेगी।
जांच प्रणाली में आएगा तकनीकी सुधार
इस पहल को प्रदेश की जांच प्रणाली में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखा जा रहा है। आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से न केवल मामलों की तह तक पहुंचना आसान होगा, बल्कि जांच की पारदर्शिता और विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।