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Military Cadet Rehabilitation Policy: अब ट्रेनिंग में दिव्यांग हुए जांबाजों को मिलेगा सम्मान और अधिकार, SC ने लिया निर्णय

Military Cadet Rehabilitation Policy: भारतीय सैन्य अकादमी की कठोर ट्रेनिंग के दौरान अपने शरीर का अंग गंवाने वाले कैडेटों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक संवेदनशील रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि सैन्य प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांगता के कारण बाहर किए गए अधिकारी कैडेटों के पुनर्वास के लिए (Social Security Framework) से जुड़ी सिफारिशों को जल्द अंतिम रूप दिया जाए। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि तीनों सेनाओं—थल सेना, नौसेना और वायुसेना—ने इस विषय पर सकारात्मक सुझाव दिए हैं। अब रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की अंतिम मुहर का इंतजार है, ताकि इन युवाओं का भविष्य सुरक्षित हो सके।

Military Cadet Rehabilitation Policy
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न्याय मित्र के सुझाव और सरकार का आश्वासन

इस मामले में अदालत ने स्वयं संज्ञान लेते हुए एक व्यापक कानूनी प्रक्रिया शुरू की थी। न्याय मित्र वरिष्ठ वकील रेखा पल्ली ने कोर्ट के समक्ष (Medical Assistance Programs) के साथ-साथ शिक्षा, आर्थिक मदद और बीमा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर सुझाव दिए हैं। केंद्र सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भरोसा दिलाया है कि अगस्त 2025 से ऐसे सभी कैडेटों को ‘पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना’ (Military Cadet Rehabilitation Policy) के दायरे में शामिल कर लिया गया है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इन दिव्यांग कैडेटों से इस योजना के लिए कोई एकमुश्त शुल्क भी नहीं लिया जा रहा है, जो उनके इलाज के रास्ते को सुगम बनाएगा।

बढ़ती महंगाई और अपर्याप्त आर्थिक सहायता की चुनौती

अदालत ने सुनवाई के दौरान एक कड़वी सच्चाई की ओर भी इशारा किया कि वर्तमान में मिलने वाली एकमुश्त राशि और बीमा कवर समय के साथ अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। बढ़ती (Cost of Living) के दौर में पुरानी दरें इन दिव्यांग युवाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए नाकाफी हैं। आंकड़ों के अनुसार, 1985 से अब तक लगभग 500 ऐसे कैडेट इस त्रासदी का शिकार हो चुके हैं जो आज भी आर्थिक और चिकित्सा संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इन राशियों में सम्मानजनक बढ़ोतरी पर विचार करने को कहा है ताकि उनके जीवन का संघर्ष कुछ कम हो सके।

निर्दोष होने की धारणा और बरी करने के कानूनी सिद्धांत

एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक न्यायशास्त्र के एक बुनियादी सिद्धांत को दोहराया है। जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि किसी आरोपी को निचली अदालत से (Aquittal Order) मिलने के बाद उसे पलटना कोई सामान्य बात नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अदालत ने कहा कि जब एक बार कोर्ट किसी को बरी कर देता है, तो उसके निर्दोष होने की धारणा और भी मजबूत हो जाती है। सजा सुनाने के लिए ऊपरी अदालत के पास बेहद ठोस और अपरिवर्तनीय कारण होने चाहिए, अन्यथा बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

चुनाव आयोग और मीडिया रिपोर्टों पर अदालत की सख्ती

बिहार मतदाता सूची से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ ‘एडीआर’ की उस याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगने से इनकार कर दिया जो केवल मीडिया रिपोर्टों पर आधारित थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि (Democratic Processes) के संचालन में केवल अखबार की कतरनों के आधार पर संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि यदि वे कोई गंभीर आरोप लगाना चाहते हैं, तो उन्हें तथ्यों के साथ औपचारिक हलफनामा दाखिल करना होगा। अदालत ने माना कि मीडिया रिपोर्टें हमेशा पूर्ण सत्य नहीं होतीं और केवल उन पर भरोसा करना एक गलत मिसाल कायम कर सकता है।

हलफनामे की अनिवार्यता और कानूनी प्रक्रिया का सम्मान

अदालत में चुनाव आयोग का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि मतदाता नाम हटाने के नोटिस नियमानुसार जिला अधिकारियों द्वारा ही जारी किए गए थे। उन्होंने (Legal Accountability) पर जोर देते हुए कहा कि आयोग को किसी भी रैंडम मीडिया रिपोर्ट पर अचानक जवाब देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए स्पष्ट किया कि जब तक कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं लाया जाता, तब तक अदालत दूसरे पक्ष से स्पष्टीकरण नहीं मांग सकती। कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना हर याचिकाकर्ता के लिए अनिवार्य है।

सैन्य कैडेटों के सम्मानजनक पुनर्वास की अगली तारीख

देश के भविष्य और सीमाओं की रक्षा का सपना देखने वाले उन युवाओं के लिए 20 जनवरी की तारीख बेहद अहम होने वाली है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को (Policy Implementation) के लिए छह सप्ताह का जो समय दिया है, वह यह तय करेगा कि ट्रेनिंग के दौरान अपनी शारीरिक क्षमता खोने वाले कैडेटों को समाज में फिर से कैसे स्थापित किया जाएगा। यह मामला केवल आर्थिक मदद का नहीं है, बल्कि उस गौरव और सम्मान को वापस दिलाने का है जिसके वे हकदार हैं। अब सबकी नजरें रक्षा मंत्रालय के अगले कदम पर टिकी हैं कि वे इन जांबाजों के लिए कितनी संवेदनशीलता दिखाते हैं।

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