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MGNREGA – बीस साल बाद कांग्रेस बोली, नई योजना ने रोजगार के अधिकार बदले

MGNREGA – सोमवार को कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला करते हुए दावा किया कि ग्रामीण रोजगार की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना में मूलभूत बदलाव कर दिए गए हैं। पार्टी का कहना है कि मनरेगा अपने समय का ऐतिहासिक और अधिकार-आधारित कानून था, लेकिन मौजूदा सरकार द्वारा लाई गई नई व्यवस्था ने इसकी आत्मा को कमजोर कर दिया है। कांग्रेस नेताओं ने इसे सिर्फ नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि ग्रामीण मजदूरों के कानूनी अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया। पार्टी ने इस बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़ाकर संस्थागत ढांचे, वित्तीय जिम्मेदारियों और स्थानीय लोकतंत्र पर पड़ने वाले असर के संदर्भ में रखा।

बीस साल पहले की शुरुआत और ऐतिहासिक संदर्भ

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने याद दिलाया कि ठीक दो दशक पहले आज ही के दिन मनरेगा की औपचारिक शुरुआत आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के बदनपल्ली गांव से हुई थी। उन्होंने उस दौर की एक तस्वीर साझा करते हुए बताया कि दलित महिला चीमाला पेडक्का इस योजना की पहली जॉब कार्ड धारक बनी थीं, जो बाद में लाखों ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार सुरक्षा का प्रतीक बन गईं। रमेश के मुताबिक, यह योजना केवल मजदूरी का साधन नहीं थी, बल्कि ग्रामीण भारत के लिए गरिमा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुरक्षा का माध्यम बनी।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मनरेगा का प्रभाव

कांग्रेस ने कहा कि बीस वर्षों में मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों को करीब 180 करोड़ कार्यदिवस मिले, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं। इस अवधि में लगभग दस करोड़ सामुदायिक परिसंपत्तियां बनाई गईं, जिनमें तालाब, सड़कें, जल संरक्षण ढांचे और अन्य ग्रामीण बुनियादी ढांचा शामिल है। पार्टी के अनुसार, इससे मजबूरी में होने वाले पलायन में उल्लेखनीय कमी आई और ग्राम पंचायतों की निर्णय-क्षमता मजबूत हुई। रमेश ने यह भी रेखांकित किया कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) प्रणाली की नींव भी इसी योजना के जरिए ग्रामीण स्तर पर पड़ी।

कानूनी अधिकार बनाम प्रशासनिक योजना

कांग्रेस का तर्क है कि मनरेगा सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि काम की कानूनी गारंटी थी, जो संविधान के अनुच्छेद 41 की भावना से जुड़ी थी। इसके तहत कोई भी ग्रामीण नागरिक काम मांग सकता था और प्रशासन उसे उपलब्ध कराने के लिए बाध्य था। परियोजनाओं का चयन स्थानीय ग्राम पंचायतें करती थीं, जबकि कुल लागत का केवल दस प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकारों को वहन करना पड़ता था। ग्राम सभा और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा नियमित सामाजिक व वित्तीय ऑडिट इसकी पारदर्शिता सुनिश्चित करते थे।

केंद्र की नई योजना पर कांग्रेस के आरोप

कांग्रेस का आरोप है कि नई व्यवस्था में निर्णय लेने की शक्ति बड़े पैमाने पर नई दिल्ली में केंद्रित कर दी गई है। अब यह तय करना केंद्र सरकार के हाथ में होगा कि किन जिलों में काम मिलेगा, जबकि पहले यह स्थानीय जरूरतों पर आधारित था। पार्टी का दावा है कि काम अब मांग-आधारित नहीं बल्कि बजट-आधारित हो जाएगा, जिससे ग्रामीण मजदूरों की सौदेबाजी की क्षमता घटेगी। इसके अलावा, कृषि के व्यस्त मौसम में दो महीने के लिए काम पूरी तरह बंद रखने का प्रावधान मजदूरों के लिए नुकसानदेह बताया गया है।

पंचायतों की भूमिका और राज्यों पर वित्तीय बोझ

कांग्रेस नेताओं ने कहा कि नई व्यवस्था में पंचायतों की भूमिका काफी सीमित कर दी गई है और परियोजनाओं का चयन ऊपर से थोपे जाने की आशंका है। सबसे बड़ा विवाद वित्तीय हिस्सेदारी को लेकर है, क्योंकि अब राज्यों को कुल खर्च का 40 प्रतिशत वहन करना होगा। पार्टी का कहना है कि कई राज्यों की मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह बोझ अव्यावहारिक है और इससे धीरे-धीरे रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।

नया कानून क्या कहता है

दिसंबर 2025 में पारित ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) एक्ट, 2025’ के तहत रोजगार की गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। हालांकि, इसके साथ ही फंडिंग पैटर्न, योजना निर्माण प्रक्रिया और क्रियान्वयन तंत्र में बड़े बदलाव किए गए हैं। सरकार का दावा है कि इससे योजना अधिक प्रभावी बनेगी, लेकिन विपक्ष का मानना है कि इससे मनरेगा का अधिकार-आधारित स्वरूप कमजोर हुआ है।

विपक्ष की व्यापक चिंता

विपक्षी दलों का कहना है कि नया कानून सत्ता के केंद्रीकरण को बढ़ाता है और स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका घटाता है। उनका तर्क है कि बढ़ती वित्तीय जिम्मेदारी के कारण राज्य सरकारें काम देने में पीछे हट सकती हैं, जिससे ग्रामीण मजदूरों का मूल कानूनी अधिकार प्रभावित होगा। कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार इन प्रावधानों पर पुनर्विचार करे और राज्यों व पंचायतों को पहले जैसी भूमिका वापस दे।

आगे की राजनीतिक और नीतिगत बहस

इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में संसद और राज्यों में तीखी बहस होने की संभावना है। कांग्रेस इसे केवल रोजगार का मामला नहीं, बल्कि ग्रामीण न्याय, संघीय ढांचे और स्थानीय स्वशासन से जुड़ा प्रश्न मान रही है। वहीं, सरकार का रुख है कि नई व्यवस्था अधिक जवाबदेही और बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करेगी। फिलहाल यह विवाद नीति, राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के चौराहे पर खड़ा है।

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