Marathi Manus and Mumbai Politics: मुंबई को अलग करने की रची जा रही है साजिश, राज और उद्धव ने भरी हुंकार
Marathi Manus and Mumbai Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ तब आया जब दो धुर विरोधी चचेरे भाई, राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे, एक साझा मंच पर नजर आए। शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित इस धमाकेदार साक्षात्कार में राज ठाकरे ने सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी पर प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जो शक्तियां मुंबई को महाराष्ट्र (Protection of Regional Identity) से अलग करने का गुप्त एजेंडा चला रही हैं, आज विडंबना यह है कि वही ताकतें केंद्र और राज्य की सत्ता की बागडोर संभाले हुए हैं। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मराठी मानुस की अस्मिता को लेकर दी गई एक गंभीर चेतावनी है।

राजनीतिक अस्तित्व नहीं बल्कि मराठी मानुस के अधिकारों की जंग
इस विशेष साक्षात्कार के दौरान चचेरे भाइयों ने स्पष्ट किया कि उनका साथ आना किसी चुनावी फायदे या राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की कवायद नहीं है। राज ठाकरे ने भावनात्मक लहजे में कहा कि वे महाराष्ट्र में रहने वाले (Rights of Native Residents) लोगों के अधिकारों और उनकी पहचान की रक्षा के लिए एक साथ खड़े हुए हैं। 15 जनवरी को होने वाले बीएमसी चुनावों के मद्देनजर यह गठबंधन न केवल रणनीतिक है, बल्कि यह उन लोगों को सीधा संदेश है जो महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और भौगोलिक अखंडता के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश कर रहे हैं।
बाहरी दखल और बदलते निर्वाचन क्षेत्रों का बढ़ता खतरा
साक्षात्कार के दौरान राज ठाकरे ने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे को छुआ, जो राज्य के जनसांख्यिकीय ढांचे से जुड़ा है। उन्होंने दावा किया कि राज्य के बाहर से आने वाले लोग अब केवल रोजगार और आजीविका की तलाश में नहीं आ रहे हैं, बल्कि वे सुनियोजित तरीके से (Demographic Shifts in Urban Areas) अपने स्वयं के राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र तैयार कर रहे हैं। उनके अनुसार, यह एक पुराना घाव है जिसे एक बार फिर कुरेदा जा रहा है, ताकि मुंबई को महाराष्ट्र से काटकर अलग करने के वर्षों पुराने सपने को हकीकत में बदला जा सके।
संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन जैसे हालात की आहट
राज ठाकरे ने वर्तमान राजनीतिक माहौल की तुलना उस ऐतिहासिक ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ से की, जब गुजरात मुंबई को अपना हिस्सा बनाना चाहता था। उन्होंने जनता को आगाह किया कि अगर स्थानीय नगर निकायों और महानगर पालिकाओं पर (Local Body Elections Strategy) ऐसी शक्तियों का नियंत्रण हो गया जो महाराष्ट्र के हितों के खिलाफ हैं, तो भविष्य में मराठी मानुष पूरी तरह से शक्तिहीन और लाचार हो जाएगा। उनके अनुसार, नगर निगमों पर कब्जा करना केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि मुंबई की चाबी उन हाथों में सौंपना है जो इसे राज्य से अलग करना चाहते हैं।
विकास के नाम पर विनाश का खेल और ठेकेदारों का राज
पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए और विकास के दावों की पोल खोली। उन्होंने तर्क दिया कि भाजपा जिस विकास का ढिंढोरा पीट रही है, वह वास्तव में प्रगति नहीं बल्कि विनाश की ओर ले जाने वाला (Unplanned Urban Development) रास्ता है। उद्धव ने तंज कसते हुए कहा कि यह ‘बिना योजना वाला विकास’ है, जहां सत्ता में बैठे लोग मराठी भाषी होने के बावजूद मुंबई की जनता के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, बल्कि वे केवल चुनिंदा ठेकेदारों की तिजोरियां भरने के लिए काम कर रहे हैं।
सत्ता के गलियारों में दिशाहीनता और जवाबदेही का अभाव
उद्धव ठाकरे ने वर्तमान राज्य सरकार की कार्यक्षमता पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रशासन को खुद नहीं पता कि वह वास्तव में क्या हासिल करना चाहता है। उनके अनुसार, सरकार (Lack of Administrative Vision) पूरी तरह से दिशाहीन हो चुकी है और उसे आम नागरिकों की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। सत्ता में बैठे लोगों का ध्यान केवल उन परियोजनाओं पर है जो बड़े कॉरपोरेट्स को फायदा पहुंचाती हैं, जबकि आम मुंबईकर अपने बुनियादी अधिकारों के लिए आज भी संघर्ष कर रहा है।
नशीली दवाओं का बढ़ता जाल और राजनीतिक संरक्षण का आरोप
साक्षात्कार के एक अन्य हिस्से में राज ठाकरे ने राज्य में बढ़ते ड्रग्स माफिया और नशे के कारोबार पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने दावा किया कि राजनीति में काले धन के इस्तेमाल और आसानी से उपलब्ध होने वाले मादक पदार्थों (Drug Trafficking and Political Links) के बीच एक गहरा और अटूट संबंध है। उन्होंने राज्य सरकार को घेरते हुए कहा कि अब नशीली दवाओं के खिलाफ होने वाली छापेमारी लगभग बंद हो गई है और ऐसा लगता है कि राज्य में तस्करी पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है, जो युवा पीढ़ी के लिए घातक है।
नगर निकायों पर नियंत्रण: अस्मिता बचाने का आखिरी विकल्प
अंत में, एमएनएस प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि अगर मुंबई, पुणे, ठाणे और छत्रपति संभाजीनगर जैसे प्रमुख शहरों के संसाधनों और भूमि पर बाहरी कब्जों को रोकना है, तो नगर निकायों (Municipal Corporation Governance) का नियंत्रण अपनों के हाथ में होना अनिवार्य है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन नगर निगमों की सत्ता हाथ से निकल गई, तो महाराष्ट्र का गौरव कहे जाने वाले ये शहर अपनी पहचान खो देंगे। यह साक्षात्कार महाराष्ट्र की भविष्य की राजनीति की एक नई और आक्रामक दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।



