Manipur Violence – वर्षों पुराने जातीय विवाद ने फिर बढ़ाई राज्य की चिंता
Manipur Violence – मणिपुर में शांति स्थापित करने के प्रयासों के बीच हाल में हुई छह लोगों की हत्या ने राज्य में सुरक्षा और सामाजिक तनाव को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। घटना के बाद इंफाल स्थित जवाहरलाल नेहरू आयुर्विज्ञान संस्थान (जेएनआईएमएस) के बाहर बड़ी संख्या में लोग एकत्र हो गए। बताया गया कि ये लोग उन छह नगा समुदाय के व्यक्तियों के शव लेने पहुंचे थे, जिनके बारे में आरोप है कि उन्हें मई 2026 में लेइलोन वैफेई गांव से अगवा किया गया था। स्थिति तनावपूर्ण होने पर सुरक्षा बलों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया।

मौजूदा हिंसा की जड़ें काफी पुरानी
मणिपुर में चल रहा संघर्ष किसी एक हालिया घटना का परिणाम नहीं है। इसके पीछे दशकों से चली आ रही जातीय असहमति, भूमि से जुड़े विवाद और क्षेत्रीय पहचान के मुद्दे प्रमुख कारण माने जाते हैं। राज्य में अलग-अलग समुदायों के बीच अविश्वास समय के साथ गहराता गया, जिसका असर समय-समय पर हिंसक घटनाओं के रूप में सामने आता रहा है। मई 2023 में भड़की व्यापक हिंसा के बाद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं।
भूगोल और जनसंख्या का समीकरण
मणिपुर की भौगोलिक संरचना भी विवाद के प्रमुख कारणों में शामिल रही है। राज्य की इंफाल घाटी कुल क्षेत्रफल का लगभग दस प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन यहां बड़ी आबादी निवास करती है, जिसमें मैतेई समुदाय प्रमुख है। दूसरी ओर, पहाड़ी क्षेत्र राज्य के अधिकांश भूभाग में फैले हुए हैं, जहां मुख्य रूप से नगा और कुकी जनजातियां रहती हैं। संसाधनों, भूमि अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर विभिन्न समुदायों के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं।
अलग-अलग समुदायों के आंदोलन और संघर्ष
राज्य में नगा, कुकी और मैतेई समुदायों से जुड़े कई संगठन दशकों से सक्रिय रहे हैं। नगा समूहों ने अपने समुदाय के लोगों के लिए व्यापक क्षेत्रीय एकीकरण की मांग उठाई, जबकि कुकी संगठनों ने भूमि और पहचान से जुड़े अधिकारों को लेकर आंदोलन किए। वहीं मैतेई समुदाय के कुछ संगठनों ने भी अलग राजनीतिक और सामाजिक मांगों को लेकर अपनी गतिविधियां जारी रखीं। समय के साथ इन आंदोलनों ने कई बार हिंसक रूप भी लिया।
सुरक्षा कानून और शांति प्रयास
बढ़ती उग्रवादी गतिविधियों के बीच केंद्र सरकार ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) लागू किया था। इसका उद्देश्य सुरक्षा बलों को संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष अधिकार प्रदान करना था। बाद के वर्षों में कई शांति पहल भी शुरू की गईं। वर्ष 2008 में केंद्र, राज्य सरकार और कुछ कुकी संगठनों के बीच समझौते के बाद संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा स्थिति में सुधार भी देखा गया।
भूमि और आरक्षण का मुद्दा
हाल के वर्षों में मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति दर्जे की मांग ने विवाद को और जटिल बना दिया। समुदाय का तर्क है कि सीमित भूभाग में बढ़ती आबादी के कारण उन्हें भूमि संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों का मानना है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था उनकी पारंपरिक भूमि की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। इसी मुद्दे पर आए न्यायिक निर्देशों के बाद विभिन्न समूहों के बीच विरोध-प्रदर्शन तेज हुए थे।
संसद में भी उठा था मुद्दा
मणिपुर की स्थिति पर संसद में भी चर्चा हो चुकी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पहले कहा था कि राज्य में हुई हिंसा दो समुदायों के बीच उत्पन्न जातीय तनाव से जुड़ी है। उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसे विवादों का समाधान संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए। सरकार का दावा रहा है कि हिंसा को नियंत्रित करने और शांति बहाल करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
अब भी बनी हुई है चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि मणिपुर में स्थायी शांति केवल सुरक्षा उपायों से संभव नहीं होगी। इसके लिए विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बहाली, संवाद और दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता है। हालिया घटनाएं यह संकेत देती हैं कि राज्य में सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं, जिनका समाधान सभी पक्षों की भागीदारी से ही संभव होगा।