Justice Yashwant Verma Case 2026: भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे जज को लगा झटका, अब संसद की चौखट पर होगा न्याय
Justice Yashwant Verma Case 2026: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही संसदीय जांच को चुनौती दी थी। इस (Judicial Accountability Standards) के लिहाज से इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शीर्ष अदालत के इस रुख ने साफ कर दिया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को भी जांच की प्रक्रिया से गुजरना होगा, खासकर तब जब आरोप भ्रष्टाचार जैसे गंभीर विषयों से जुड़े हों।

संसदीय पैनल की वैधता पर लगी मुहर
जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित की गई जांच समिति की वैधता पर सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि जब राज्यसभा के उपसभापति ने उनके खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव को पहले ही खारिज कर दिया था, तो लोकसभा स्पीकर द्वारा समिति बनाना (Justice Yashwant Verma Case 2026) के सिद्धांतों के खिलाफ है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना और संसदीय समिति को अपनी जांच प्रक्रिया को नियमानुसार आगे बढ़ाने के लिए हरी झंडी दे दी है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनाया फैसला
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की खंडपीठ ने इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए 8 जनवरी 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। याचिकाकर्ता जज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पैरवी की थी, लेकिन (Supreme Court Judgment Trends) के मुताबिक अदालत ने संसदीय विशेषाधिकार और जजेज इन्क्वायरी एक्ट की शक्ति को सर्वोपरि माना। इस फैसले के बाद अब जस्टिस वर्मा को संसदीय समिति के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा।
जजेज इन्क्वायरी एक्ट की धारा 3(2) पर बहस
इस कानूनी लड़ाई का मुख्य केंद्र 1968 का जजेज इन्क्वायरी एक्ट रहा है। जस्टिस वर्मा की दलील थी कि लोकसभा स्पीकर ने एकतरफा तरीके से समिति का गठन करके उनके अधिकारों का हनन किया है। उनके वकील ने तर्क दिया कि कानून के तहत (Equal Protection of Law) का अधिकार हर नागरिक को प्राप्त है, चाहे वह जज ही क्यों न हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक ही मामले में दो सदनों के अलग-अलग रुख के बीच स्पीकर का यह फैसला प्रक्रियात्मक खामियों से भरा हुआ है, जिसे अदालत ने अंततः खारिज कर दिया।
भारी मात्रा में अधजली नकदी का रहस्य
यह पूरा मामला किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जिसकी शुरुआत पिछले साल मार्च में हुई थी। दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर अचानक भीषण आग लग गई थी, जिसके बुझने के बाद वहां से भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी। मलबे के बीच (Unaccounted Cash Recovery) के जो बंडल मिले, उनकी ऊंचाई डेढ़ फीट से भी अधिक बताई गई थी। अधजले नोटों के इन ढेरों ने न्यायपालिका की शुचिता पर कई सवाल खड़े कर दिए थे, जिसके बाद यह मामला महाभियोग तक जा पहुंचा।
दिल्ली से इलाहाबाद तक का सफर
अधजली नकदी की इस घटना ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को भी विचलित कर दिया था। प्राथमिक जांच और घटना की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। इस (Judicial Transfer Policy) के पीछे मुख्य उद्देश्य जांच को निष्पक्ष बनाए रखना था। हालांकि, तबादले के बावजूद भ्रष्टाचार के आरोपों की आंच कम नहीं हुई और संसद के सदस्यों ने उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का नोटिस दे दिया।
तीन सदस्यीय जांच पैनल का गठन
अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस मामले की गहराई से जांच करने के लिए तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय पैनल की घोषणा की थी। इस शक्तिशाली पैनल में (High Level Inquiry Committee) के सदस्य के रूप में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंदर मोहन और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल हैं। यह समिति अब इस बात की जांच करेगी कि आवास से मिली उस भारी भरकम नकदी का स्रोत क्या था और क्या इसमें पद के दुरुपयोग का कोई पहलू शामिल है।
महाभियोग की प्रक्रिया और संवैधानिक पेच
भारतीय संविधान में किसी जज को पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और गरिमापूर्ण है। जस्टिस वर्मा के मामले में तकनीकी पेंच यह था कि एक सदन में प्रस्ताव गिरा और दूसरे में जांच शुरू हुई। (Constitutional Impeachment Process) के तहत अब लोकसभा की यह समिति अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। यदि रिपोर्ट में आरोप सिद्ध पाए जाते हैं, तो संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से इस पर मतदान होगा। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने इस संवैधानिक मशीनरी को निर्बाध रूप से काम करने का रास्ता दे दिया है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का संदेश
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्यायपालिका के भीतर स्वच्छता अभियान के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि (Judicial Integrity and Ethics) को बनाए रखने के लिए ऐसे कड़े फैसलों की आवश्यकता थी। जनता के बीच जजों की छवि और न्याय प्रणाली पर अटूट विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि किसी भी प्रकार के वित्तीय कदाचार की निष्पक्ष जांच हो। अदालत ने यह संदेश दिया है कि न्याय की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति जांच से ऊपर नहीं हो सकता।
न्याय की अग्निपरीक्षा का अगला चरण
अब सबकी निगाहें उस संसदीय पैनल की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो जस्टिस वर्मा के भाग्य का फैसला करेगी। (Parliamentary Probe Committee Report) आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस जज को अपने पद से हाथ धोना पड़ेगा या वह इन आरोपों से बेदाग बाहर निकलेंगे। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट से मिली इस कानूनी हार ने जस्टिस वर्मा के बचाव के रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं और उन्हें अब संसदीय समिति की जांच की आग से गुजरना ही होगा।



