Environmental Scientist Madhav Gadgil Death: हमेशा के लिए सो गया प्रकृति का बेटा, माधव गाडगिल का 83 वर्ष की आयु में हुआ निधन
Environmental Scientist Madhav Gadgil Death: भारत के पर्यावरण आंदोलन की सबसे बुलंद आवाज़ और दुनिया के प्रतिष्ठित पारिस्थितिकी विज्ञानी माधव गाडगिल अब हमारे बीच नहीं रहे। बुधवार रात पुणे में 83 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली, जिससे देश ने एक ऐसा वैज्ञानिक खो दिया जो लैब से ज्यादा जंगलों और आदिवासियों के बीच रहना पसंद करता था। उनके पुत्र सिद्धार्थ गाडगिल ने भारी मन से इस (Loss to Environmental Science) की सूचना साझा की, जिसके बाद पूरे वैज्ञानिक जगत और प्रकृति प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है। गाडगिल केवल आंकड़ों के जादूगर नहीं थे, बल्कि वे प्रकृति की नब्ज पहचानने वाले एक दूरदर्शी मनीषी थे।

गाडगिल रिपोर्ट: वो सच जिसे सरकारों ने स्वीकार नहीं किया
माधव गाडगिल को सबसे ज्यादा उनकी 2011 की ‘गाडगिल रिपोर्ट’ के लिए याद किया जाएगा, जिसमें उन्होंने पश्चिमी घाट के 75 प्रतिशत हिस्से को संवेदनशील घोषित करने की वकालत की थी। उन्होंने वर्षों पहले चेतावनी दी थी कि पहाड़ों के साथ (Ecological Fragility and Development) का असंतुलन बड़ी आपदाओं को न्योता देगा। हालांकि, तत्कालीन सरकारों और उद्योगपतियों के दबाव में उनकी सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। आज केरल के वायनाड जैसी जगहों पर होने वाले विनाशकारी भूस्खलन चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि काश हमने उस वक्त इस महान वैज्ञानिक की बात मान ली होती।
हार्वर्ड का सुख छोड़ भारत की मिट्टी को चुना
माधव गाडगिल का जीवन त्याग और समर्पण की एक अद्भुत कहानी है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय से गणितीय पारिस्थितिकी में पीएचडी करने के बाद, उनके पास अमेरिका में ऐशो-आराम की जिंदगी जीने का पूरा मौका था। लेकिन 1970 के दशक में उन्होंने और उनकी पत्नी सुलोचना गाडगिल ने (Scientific Patriotism and Return) का मार्ग चुना और भारत लौट आए। उन्होंने विदेशी चमक-धमक के बजाय भारत के गांवों, जंगलों और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए काम करना बेहतर समझा, जो उन्हें एक ‘जनता का वैज्ञानिक’ बनाता है।
संयुक्त राष्ट्र ने नवाजा ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ सम्मान से
पर्यावरण और समाज के बीच गहरा सेतु बनाने वाले गाडगिल के कार्यों की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दी। साल 2024 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने उन्हें दुनिया के सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ से सम्मानित किया। यूएनईपी ने माना कि (Global Environmental Recognition) पाने वाले गाडगिल ने नीति-निर्माण के बंद कमरों से निकलकर आम लोगों के ज्ञान को विज्ञान का हिस्सा बनाया। उनका मानना था कि असली पारिस्थितिकी संरक्षण तभी संभव है जब इसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी हो।
हिमालय और पश्चिमी घाट पर गाडगिल की भविष्यवाणियाँ
अपने अंतिम वर्षों तक गाडगिल पर्यावरण संकट पर मुखर रहे। उन्होंने बार-बार कहा कि हिमालय और पश्चिमी घाट में आने वाली तबाही प्राकृतिक कम और मानव-निर्मित ज्यादा है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि (Impact of Deforestation on Slopes) के कारण पहाड़ों की पकड़ कमजोर हो रही है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। उनके शोध पत्रों और पुस्तकों ने न केवल छात्रों को प्रेरित किया, बल्कि भारत के ‘जैव विविधता अधिनियम’ जैसे महत्वपूर्ण कानूनों की नींव रखने में भी मदद की।
सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज की स्थापना और शैक्षणिक सफर
भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बंगलूरू में अपने 31 वर्षों के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने ‘सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज’ की स्थापना की। यहां उन्होंने केवल किताबी ज्ञान नहीं दिया, बल्कि शोधार्थियों को (Community Based Conservation Research) के लिए प्रेरित किया। उन्होंने चरवाहों, मछुआरों और किसानों के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष किया। उनके पिता, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डी.आर. गाडगिल और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के विचारों ने उनके व्यक्तित्व में सामाजिक न्याय के प्रति गहरी संवेदनशीलता भरी थी।
एक संवेदनशील वैज्ञानिक और सामाजिक विवेक का संगम
गाडगिल के व्यक्तित्व में विज्ञान और संवेदना का अनूठा मेल था। वे अक्सर कहते थे कि उन्हें इस बात का संतोष है कि उन्होंने समाज की दिशा बदलने में अपना योगदान दिया। उनके लेखन में (Indigenous Rights and Ecology) का मुद्दा हमेशा प्रमुख रहा। उन्होंने करीब सात किताबें और 225 से अधिक शोध पत्र लिखे, जो आज भी पर्यावरण संरक्षण की राह दिखाने वाले प्रकाश स्तंभ की तरह हैं। उनकी पत्नी सुलोचना गाडगिल, जो स्वयं एक महान मानसून वैज्ञानिक थीं, का साथ उनके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति था।
क्या अब भी हम उनकी विरासत से सीखेंगे?
माधव गाडगिल का निधन एक व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि उस सोच के लिए एक चेतावनी है जो विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन कर रही है। पश्चिमी घाट की अंतिम अधिसूचना का अभी भी (Final Notification of Eco Sensitive Zones) लंबित होना इस बात का प्रमाण है कि हम अब भी खतरे को अनदेखा कर रहे हैं। गाडगिल की विदाई के साथ, देश ने एक ऐसी सशक्त और ईमानदार आवाज़ खो दी है जो बिना डरे सच बोलती थी। अब यह जिम्मेदारी हम पर है कि हम उनके दिखाए गए संरक्षण के मार्ग पर चलकर इस धरती को बचाएं।



