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ElectionRow – मतदान से पहले कोर्ट का दखल, आयोग का आदेश निरस्त

ElectionRow – पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान से ठीक पहले एक अहम कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के उस निर्णय को रद्द कर दिया है, जिसमें कुछ सहायक प्रोफेसरों को पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था। इस फैसले के बाद चुनावी तैयारियों के बीच प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है।

नियुक्ति को चुनौती देने पहुंचे शिक्षक

इस मामले की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम बंगाल सरकारी कॉलेज शिक्षक संघ से जुड़े शिक्षकों ने अपनी नियुक्ति के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं, लेकिन उनके वेतन स्तर और सेवा श्रेणी को ध्यान में रखे बिना उन्हें पीठासीन अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई। उनका तर्क था कि यह निर्णय स्थापित नियमों और दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है।

अदालत ने प्रक्रिया पर उठाए सवाल

न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि इन नियुक्तियों के पीछे कोई ठोस कारण या आपात स्थिति का दस्तावेजी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना पर्याप्त औचित्य के इस तरह की नियुक्तियां नियमों का उल्लंघन मानी जाएंगी। इसी आधार पर याचिकाकर्ता प्रोफेसरों की नियुक्ति को निरस्त कर दिया गया।

चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का हवाला

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि 16 फरवरी 2010 को जारी चुनाव आयोग के एक परिपत्र में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि ग्रुप ए श्रेणी के समकक्ष अधिकारियों, जिनमें विश्वविद्यालय और कॉलेजों के शिक्षक भी शामिल हैं, को मतदान केंद्रों पर ड्यूटी तभी दी जा सकती है जब विशेष परिस्थितियों में इसकी आवश्यकता हो और उसके कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाएं। अदालत ने माना कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

शिक्षक संगठन ने दी जानकारी

याचिकाकर्ताओं के वकील शमीम अहमद ने बताया कि इस याचिका से जुड़े संगठन में 300 से अधिक सदस्य हैं। हालांकि अदालत का आदेश फिलहाल केवल उन याचिकाकर्ताओं तक सीमित है, जिन्होंने इस मामले में याचिका दायर की थी। इससे अन्य प्रभावित शिक्षकों के लिए भी कानूनी विकल्प खुल सकते हैं।

चुनावी व्यवस्था पर आयोग का पक्ष

वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने अदालत में कहा कि राज्य में दो चरणों में होने वाले मतदान के लिए लगभग 90,000 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों की तैनाती के लिए वरिष्ठता सूची तैयार करना व्यावहारिक रूप से कठिन होता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में कुछ स्तर पर ओवरलैपिंग हो सकती है।

मतदान से पहले बढ़ी प्रशासनिक चुनौती

अदालत के इस फैसले ने मतदान से पहले प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब आयोग को इन पदों पर नई नियुक्तियां करनी होंगी या वैकल्पिक व्यवस्था बनानी होगी, ताकि चुनाव प्रक्रिया सुचारु रूप से संपन्न हो सके। इस घटनाक्रम ने चुनावी तैयारियों के बीच नियमों के पालन और पारदर्शिता पर भी चर्चा को तेज कर दिया है।

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