राष्ट्रीय

CourtVerdict – ठाणे अदालत ने अपहरण और दुष्कर्म मामले में युवक को किया बरी

CourtVerdict – महाराष्ट्र के ठाणे जिले की एक विशेष अदालत ने अपहरण और दुष्कर्म के आरोपों में फंसे एक युवक को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कथित पीड़िता उस समय बालिग थी और उसने अपनी इच्छा से आरोपी के साथ जाने का निर्णय लिया था। यह आदेश विशेष पॉक्सो अदालत की न्यायाधीश रूबी यू. मलवंकर ने 24 अप्रैल को सुनाया, जिसकी जानकारी बाद में सार्वजनिक हुई। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला।

मामले की पृष्ठभूमि क्या रही

यह मामला जनवरी 2020 का है, जब ठाणे के कलवा क्षेत्र में रहने वाले एक व्यक्ति ने अपनी बेटी के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि 27 वर्षीय युवक शशिकपूर श्यामलाल गुप्ता ने उनकी नाबालिग बेटी का अपहरण किया है। पुलिस ने इस आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बाद में दोनों को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से बरामद किया। जांच के दौरान सामने आया कि दोनों ने वहां एक मंदिर में विवाह करने का दावा किया था और बाद में सूरत चले गए थे।

आरोप और कानूनी धाराएं

पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था, जिनमें अपहरण, दुष्कर्म और आपराधिक धमकी से संबंधित प्रावधान शामिल थे। साथ ही, पॉक्सो कानून के तहत भी कार्रवाई की गई थी, क्योंकि प्रारंभिक शिकायत में पीड़िता को नाबालिग बताया गया था। इस वजह से मामला गंभीर श्रेणी में रखा गया और विशेष अदालत में इसकी सुनवाई हुई।

गवाही में सामने आए विरोधाभास

सुनवाई के दौरान पीड़िता, उसके पिता और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अदालत ने पाया कि पीड़िता की उम्र को लेकर पिता के बयान में स्पष्टता नहीं थी और कई बिंदुओं पर विरोधाभास नजर आया। दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 से 19 वर्ष के बीच रही होगी। इस आधार पर अदालत ने माना कि वह अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम थी।

पीड़िता के बयान ने बदला मामला

पीड़िता ने अदालत में दिए अपने बयान में कहा कि वह अपनी इच्छा से घर से गई थी और आरोपी के साथ रहने के लिए उसने सहमति दी थी। उसने किसी प्रकार के दबाव या जबरदस्ती से इनकार किया। अदालत ने इस बयान को महत्वपूर्ण माना और कहा कि संबंध की प्रकृति स्वैच्छिक प्रतीत होती है। ऐसे में अपहरण या दुष्कर्म के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिला।

अदालत का अंतिम निष्कर्ष

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। चूंकि पीड़िता बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से आरोपी के साथ जाने की बात कही, इसलिए पॉक्सो कानून और अन्य धाराओं के तहत अपराध सिद्ध नहीं होता। इसी आधार पर आरोपी को बरी कर दिया गया।

कानूनी प्रक्रिया पर फिर उठे सवाल

इस फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि जांच के दौरान तथ्यों की पुष्टि कितनी महत्वपूर्ण होती है। उम्र से जुड़े दस्तावेज, गवाहों के बयान और परिस्थितियों का सटीक आकलन किसी भी मामले के निष्कर्ष को प्रभावित कर सकता है। अदालत ने भी अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ठोस सबूतों के बिना गंभीर आरोपों को साबित करना संभव नहीं होता।

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