राष्ट्रीय

Constitution – बीएन राव का अहम योगदान और पहला मसौदा

Constitution – भारतीय संविधान का जिक्र होते ही सबसे पहले डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम याद आता है, जिन्होंने ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। लेकिन संविधान निर्माण की इस जटिल और व्यापक प्रक्रिया में कई अन्य विद्वानों का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा। उन्हीं में से एक थे बेनेगल नरसिंह राव, जिन्हें बीएन राव के नाम से जाना जाता है। वे संविधान सभा की तदर्थ समिति का हिस्सा थे और प्रारंभिक मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी।

शुरुआती जीवन और प्रशासनिक पृष्ठभूमि

बीएन राव का जन्म 1887 में मैंगलोर में हुआ था। उनके पिता चिकित्सक और शिक्षाविद थे, जिससे उन्हें शुरुआती दौर में ही शिक्षा का मजबूत आधार मिला। उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की, जो उस समय अत्यंत कठिन मानी जाती थी। उस दौर में भारतीयों के लिए इस सेवा में प्रवेश पाना आसान नहीं था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी उनकी प्रतिभा और समझ की सराहना की थी। राव सार्वजनिक मंचों से दूर रहे, लेकिन प्रशासनिक और विधिक मामलों में उनकी गहरी पकड़ थी।

संविधान से पहले का अनुभव

1930 के दशक में उन्हें गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट में संशोधन से जुड़े कार्यों में लगाया गया। बाद में वे कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश बने। 1944 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री के रूप में भी कार्य किया। यह अनुभव उन्हें शासन और कानून की बारीकियों से परिचित कराने वाला साबित हुआ। स्वतंत्रता से ठीक पहले उन्हें संविधान सलाहकार नियुक्त किया गया, जहां उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई।

पहला मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी

1947 में बीएन राव ने भारतीय संविधान का प्रारंभिक मसौदा तैयार किया। उन्होंने इस कार्य को गंभीर अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय संवाद के आधार पर आगे बढ़ाया। वे अमेरिका, ब्रिटेन, आयरलैंड और कनाडा जैसे देशों की यात्रा पर गए, जहां उन्होंने न्यायाधीशों और संवैधानिक विशेषज्ञों से चर्चा की। विभिन्न देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं का अध्ययन कर उन्होंने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप सुझावों को संकलित किया।

दो महीनों में तैयार हुआ प्रारूप

राव ने लगभग दो महीनों में संविधान का पहला विस्तृत मसौदा तैयार कर लिया था। इसमें 240 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां शामिल थीं। यही मसौदा आगे ड्राफ्टिंग कमेटी के सामने रखा गया, जिसके आधार पर अंतिम स्वरूप विकसित किया गया। राव का मानना था कि नागरिकों को केवल अधिकारों की घोषणा नहीं, बल्कि उन्हें लागू कराने की प्रभावी व्यवस्था भी मिलनी चाहिए। इसी सोच के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 32 को विशेष महत्व दिया गया, जिसके तहत नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

संविधान निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका

भारत का संविधान आज विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधानों में गिना जाता है। वर्तमान स्वरूप में इसमें सैकड़ों अनुच्छेद, कई अनुसूचियां और अनेक संशोधन शामिल हैं। संविधान लागू होने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बीएन राव के योगदान की सराहना की थी। उन्होंने कहा था कि राव के ज्ञान और परिश्रम ने संविधान निर्माण को मजबूत आधार दिया।

बीएन राव बाद में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि भी बने। उन्होंने भले ही सार्वजनिक मंचों पर कम उपस्थिति दर्ज कराई हो, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद तैयार करने में उनकी भूमिका निर्णायक रही। इतिहास के पन्नों में उनका योगदान एक शांत लेकिन प्रभावशाली अध्याय के रूप में दर्ज है।

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