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PapadHistory – पापड़ की परंपरा और भारत में इसकी दिलचस्प कहानी

PapadHistory – भारतीय रसोई में पापड़ केवल एक सहायक व्यंजन नहीं, बल्कि स्वाद और परंपरा का अहम हिस्सा है। चाहे रोज़मर्रा का भोजन हो, त्योहारों की दावत या शादी-ब्याह का भोज, थाली में पापड़ की मौजूदगी लगभग तय मानी जाती है। होली से पहले घरों की छतों पर सूखते पापड़ इस परंपरा की झलक देते हैं। अलग-अलग अनाज और दालों से बनने वाला यह पतला, कुरकुरा व्यंजन सदियों पुरानी विरासत समेटे हुए है।

प्राचीन ग्रंथों में पापड़ का उल्लेख

खाद्य इतिहास पर लिखी गई पुस्तकों में पापड़ का इतिहास काफी पुराना बताया गया है। इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 500 ईसा पूर्व भी दाल से बने पापड़ जैसे खाद्य पदार्थ प्रचलन में थे। उड़द, मसूर और चने की दाल से तैयार किए जाने वाले इस व्यंजन का उल्लेख जैन साहित्य में भी मिलता है। उस समय इसे अलग नामों से जाना जाता था, लेकिन इसका स्वरूप आज के पापड़ जैसा ही था। समय के साथ इसकी सामग्री और बनाने के तरीके में बदलाव आए, पर इसकी मूल पहचान कायम रही।

सिंध से भारत तक का सफर

पापड़ के प्रसार की कहानी में सिंध क्षेत्र का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। माना जाता है कि वहां की जलवायु पापड़ सुखाने के लिए अनुकूल थी। विभाजन से पहले सिंधी समुदाय में यह खाद्य पदार्थ काफी लोकप्रिय था। 1947 के बाद जब बड़ी संख्या में सिंधी परिवार भारत आए, तो वे अपने साथ अपनी खानपान की परंपराएं भी लेकर आए। इसी के साथ पापड़ भी देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गया। धीरे-धीरे यह केवल एक क्षेत्रीय व्यंजन न रहकर पूरे भारत की रसोई का हिस्सा बन गया।

रोजगार का सहारा बना पापड़

विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों के सामने आजीविका की चुनौती थी। ऐसे में कई लोगों ने घरों में पापड़ बनाकर बेचने का काम शुरू किया। छोटे स्तर पर शुरू हुआ यह काम बाद में संगठित उद्योग में बदल गया। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों और घरेलू उद्योगों ने भी इसे अपनाया। आज पापड़ उत्पादन लाखों लोगों के लिए रोजगार का माध्यम है और देश-विदेश में इसकी मांग बनी हुई है।

नामों में विविधता, स्वाद में एकता

आज जिसे हम पापड़ कहते हैं, उसका प्राचीन नाम पर्पट बताया जाता है, जो संस्कृत शब्द है। समय के साथ यह पापड़ी और फिर पापड़ कहलाने लगा। भारत के अलग-अलग राज्यों में इसके अलग नाम हैं। तमिलनाडु में इसे अप्पलम, कर्नाटक में हप्पला, केरल में पापड़म और ओडिशा में पम्पड़ा कहा जाता है। नाम बदलते रहे, लेकिन खाने का आनंद वही रहा। यह विविधता भारतीय खानपान की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है।

होली से जुड़ी खास परंपरा

होली के मौसम में पापड़ और चिप्स बनाने की परंपरा खास तौर पर उत्तर भारत में देखने को मिलती है। इस समय बाजार में नए आलू आते हैं, जिनसे बने पापड़ का स्वाद अलग ही होता है। परिवार के लोग मिलकर आलू उबालते हैं, मसाले मिलाते हैं और धूप में सुखाने के लिए गोल आकार में फैलाते हैं। त्योहार के दिनों में इन पापड़ों को तलकर परोसा जाता है। यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि सामूहिकता और उत्साह का प्रतीक भी है।

बनाने की सरल प्रक्रिया

पापड़ तैयार करने की विधि सरल है, हालांकि धैर्य की जरूरत होती है। दाल या अन्य सामग्री को पीसकर मसालों के साथ आटा गूंथा जाता है। फिर छोटे-छोटे गोले बनाकर बेल दिए जाते हैं और धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह सूखने के बाद इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। तलने या सेंकने के बाद यह तुरंत खाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

आज बाजार में आलू, चावल, साबूदाना, रागी और यहां तक कि कई मिश्रित अनाज से बने पापड़ उपलब्ध हैं। बदलते समय के साथ स्वाद और विकल्प बढ़े हैं, लेकिन पापड़ की परंपरा और लोकप्रियता आज भी वैसी ही है जैसी सदियों पहले थी।

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