Makar Sankranti 2026 Date and Shubh Muhurat: मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा और खिचड़ी के शौकीनों के लिए आई बड़ी दुविधा, ज्योतिषीय आँखड़ों से जानें…
Makar Sankranti 2026 Date and Shubh Muhurat: साल 2026 में मकर संक्रांति के पर्व को लेकर श्रद्धालुओं के बीच भारी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इस वर्ष सूर्य के उत्तरायण होने के पावन अवसर के साथ ही षटतिला एकादशी की तिथि भी पड़ रही है। सनातन धर्म में (Hindu Festivals) का अपना एक विशेष महत्व होता है और जब दो महत्वपूर्ण तिथियां एक साथ आती हैं, तो पूजा-पाठ और खान-पान के नियमों को लेकर भ्रम होना स्वाभाविक है। विशेष रूप से खिचड़ी और दही-चूड़ा खाने की परंपरा इस बार तिथियों के फेर में उलझ गई है।

एकादशी पर चावल वर्जित होने का धार्मिक संकट
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति के दिन दही-चूड़ा खाने का अटूट रिवाज है, जबकि देश के बाकी हिस्सों में खिचड़ी का सेवन किया जाता है। लेकिन इस बार समस्या यह है कि संक्रांति के दिन ही (Shattila Ekadashi) का व्रत भी पड़ रहा है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन चावल या उससे बनी वस्तुओं का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है। ऐसे में चूड़ा (जो धान से बनता है) और खिचड़ी खाने को लेकर भक्तों के मन में संशय है कि वे परंपरा निभाएं या व्रत के नियमों का पालन करें।
षटतिला एकादशी की सही तिथि और समय
दृक पंचांग के विश्लेषण के अनुसार, षटतिला एकादशी की तिथि 13 जनवरी 2026 को दोपहर 03:17 बजे से प्रारंभ होकर 14 जनवरी को शाम 05:52 बजे तक रहेगी। उदया तिथि की गणना के आधार पर (Ekadashi Vrat) 14 जनवरी 2026, बुधवार को रखा जाएगा। यही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से 14 तारीख को चावल से बनी खिचड़ी या दही-चूड़ा खाना शास्त्र सम्मत नहीं माना जा रहा है, क्योंकि यह व्रत की मर्यादा के विरुद्ध होगा।
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश और संक्रांति का काल
ज्योतिषीय गणना बताती है कि 14 जनवरी 2026 को दोपहर 03:13 बजे सूर्य देव धनु राशि का परित्याग कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के इसी संक्रमण को (Surya Sankranti) कहा जाता है। चूंकि सूर्य का यह गोचर दोपहर के बाद हो रहा है और उस समय तक दिन का एक बड़ा हिस्सा बीत चुका होगा, इसलिए पुण्य काल और उदया तिथि को लेकर विद्वानों में दो मत बन रहे हैं। ज्योतिषियों का एक समूह अगले दिन को अधिक शुभ मान रहा है।
उदया तिथि के अनुसार 15 जनवरी की सार्थकता
शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति जैसे महापर्व को उदया तिथि के आधार पर मनाना श्रेष्ठ माना जाता है। चूंकि 14 जनवरी को सूर्य का प्रवेश सूर्यास्त के करीब हो रहा है, इसलिए 15 जनवरी 2026 को (Udaya Tithi) में मकर संक्रांति मनाना अधिक तर्कसंगत है। ऐसा करने से एक बड़ा लाभ यह भी होगा कि एकादशी की तिथि समाप्त हो जाएगी और लोग बिना किसी धार्मिक संकोच के खिचड़ी और दही-चूड़ा का आनंद ले सकेंगे।
सूर्य की चाल और बदलती तिथियों का विज्ञान
मकर संक्रांति का पर्व किसी निश्चित कैलेंडर तारीख या चंद्र तिथि पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह पूरी तरह सूर्य की गति पर आधारित है। खगोलीय परिवर्तनों के कारण (Solar Cycle) में हर 70 से 75 वर्षों में एक दिन का अंतर आ जाता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सदियों पहले यह त्योहार 10 या 11 जनवरी को मनाया जाता था, लेकिन अब यह धीरे-धीरे 14 और 15 जनवरी की ओर खिसक गया है। भविष्य में यह तारीख और आगे बढ़ सकती है।
स्नान और दान के लिए सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त
धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान और तिल-गुड़ के दान का फल अनंत होता है। यदि आप 15 जनवरी को यह पर्व मनाते हैं, तो आपको (Auspicious Time for Charity) का पूरा लाभ मिलेगा। इस दिन एकादशी का प्रभाव समाप्त होने के कारण ब्राह्मणों को खिचड़ी का दान करना और स्वयं प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करना अत्यंत लाभकारी और दोषमुक्त माना जाएगा।
कब और कैसे खाएं दही-चूड़ा और खिचड़ी?
दही-चूड़ा के प्रेमियों के लिए सलाह यह है कि वे षटतिला एकादशी की पवित्रता बनाए रखने के लिए 14 जनवरी को सात्विक फलाहार ही करें। 15 जनवरी की सुबह स्नान के बाद (Traditional Meal) के रूप में दही-चूड़ा और तिल का सेवन करना सबसे उत्तम रहेगा। इससे न केवल आपके कुल की परंपरा सुरक्षित रहेगी, बल्कि आप एकादशी के नियमों का उल्लंघन करने के पाप से भी बच जाएंगे। संक्रांति का असली उल्लास तभी है जब वह नियमों के दायरे में रहकर मनाया जाए।
ज्योतिषियों और विद्वानों का सामूहिक मत
देश के अधिकांश हिस्सों में काशी और मिथिला के पंचांगों को आधार मानकर उत्सव मनाए जाते हैं। इस बार विद्वानों का सुझाव है कि (Religious Guidelines) का पालन करते हुए 15 जनवरी को ही खिचड़ी उत्सव मनाना श्रेयस्कर है। मकर संक्रांति का पुण्य काल सूर्य के राशि प्रवेश के बाद शुरू होता है, जो 15 जनवरी को पूरे दिन प्रभावी रहेगा। इस दिन दान-पुण्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है और सूर्य देव की कृपा बनी रहती है।
निष्कर्ष: परंपरा और भक्ति का सही संतुलन
अंततः, मकर संक्रांति का यह पर्व हमें प्रकृति और सूर्य के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देता है। तिथियों के इस फेरबदल में (Faith and Tradition) के बीच संतुलन बनाना ही समझदारी है। 15 जनवरी को दही-चूड़ा और खिचड़ी खाकर आप अपने सांस्कृतिक गौरव को भी बढ़ा सकते हैं और एकादशी के व्रत का सम्मान भी कर सकते हैं। यह दिन नई शुरुआत, उमंग और दान के जरिए समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने का संदेश देता है।



