Mahashivratri – आस्था, संतुलन और त्याग का महापर्व है महाशिवरात्रि
Mahashivratri – महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के उस गहरे भाव का प्रतीक है जो शिव के सहज, निराले और व्यापक स्वरूप से जुड़ा है। शिव का स्मरण करते ही मन में एक ऐसे देवता की छवि उभरती है जो वैभव से दूर होकर भी सबसे अधिक समृद्ध हैं। उनके हाथ में भिक्षा-पात्र है, पर वे ऐसे दानी हैं कि कोई भी उनके दर से खाली नहीं लौटता। यह पर्व केवल पूजा-अर्चना का अवसर नहीं, बल्कि अपने भीतर बसे उस आत्मविश्वास को जगाने का दिन है जो हमें हीनता से मुक्त करता है और जीवन के वास्तविक अर्थ से जोड़ता है।

अद्भुत और सहज स्वरूप वाले देव
शिव को किसी भव्य मंदिर की आवश्यकता नहीं। वे कभी पेड़ की छांव में, कभी नदी किनारे पत्थरों के बीच, तो कभी घर के छोटे से पूजास्थल में सहज ही अनुभव किए जा सकते हैं। उनके लिए स्थान का बंधन नहीं, भाव ही सबसे बड़ा माध्यम है। वे भक्ति के गीत में भी हैं, नृत्य की लय में भी और मौन ध्यान में भी। मिट्टी, जल, वायु और अग्नि—हर तत्व में उनकी उपस्थिति का विश्वास भारतीय मन को शक्ति देता है। शिव का यही सहज रूप उन्हें जन-जन का देव बनाता है।
श्मशान से शिखर तक की यात्रा
शिव का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा दिखाई देता है। वे भस्म रमाते हैं, श्मशान को अपना निवास मानते हैं, और मृत्यु को भी जीवन का हिस्सा स्वीकारते हैं। उनके गले में सर्प है, जटाओं में गंगा है और ललाट पर चंद्रमा की शीतलता। यह संदेश है कि भय और सौंदर्य, जीवन और मृत्यु—सब एक ही चक्र के हिस्से हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि जो अनदेखा है, जो असहज लगता है, वही गहन सत्य भी हो सकता है।
अकिंचनता में छिपा ऐश्वर्य
शिव का सबसे बड़ा संदेश है कि वास्तविक समृद्धि बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि भीतर की निर्लिप्तता में है। जिनके पास कुछ नहीं, वे भी आत्मबल से भरपूर हो सकते हैं। भारतीय समाज में शिव की लोकप्रियता का कारण यही है कि वे हर वर्ग के देवता हैं। वे राजा के भी हैं और साधारण जन के भी। उनसे जुड़कर व्यक्ति अपने भीतर एक स्वाभाविक गरिमा अनुभव करता है। यह भावना ही उसे मानसिक रूप से समृद्ध बनाती है।
शिव और शक्ति का संतुलन
शिव का अस्तित्व शक्ति के बिना अधूरा है। पार्वती के साथ उनका संबंध केवल दांपत्य का प्रतीक नहीं, बल्कि संतुलन का संदेश है। एक ओर तप और वैराग्य है, तो दूसरी ओर स्नेह और गृहस्थ जीवन। लोककथाओं में वर्णित प्रसंग बताते हैं कि शिव और पार्वती के बीच संवाद और संतुलन ही सृष्टि की धुरी है। जहां त्याग है, वहां करुणा भी है। जहां शक्ति है, वहां संयम भी है। यही संतुलन समाज को दिशा देता है।
दान और करुणा की परंपरा
कथाओं में वर्णन मिलता है कि शिव ने पार्वती से प्राप्त सौभाग्य का प्रतीक मार्ग में बांट देने का सुझाव दिया। इसका संकेत यही है कि सुख और संपदा का मूल्य तभी है जब वह साझा हो। जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, वही सच्चा पुण्य है। शिव का जीवन त्याग, दान और समानता का संदेश देता है। वे भूखे-नंगे के लिए अन्न मांगते हैं और हर प्राणी के दुख को अपना मानते हैं।
गृहस्थ जीवन का आदर्श
अक्सर शिव को संन्यासी रूप में देखा जाता है, पर वे आदर्श गृहस्थ भी हैं। उनका परिवार विविधताओं से भरा है—गण, पशु, देव और मानव सब साथ हैं। यह संदेश है कि परिवार केवल रक्त संबंधों से नहीं, बल्कि स्वीकृति और सह-अस्तित्व से बनता है। जीवन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद और उतार-चढ़ाव को समान भाव से स्वीकारना ही शिव का स्मरण है। अंधकार भी उसी प्रकाश का हिस्सा है, जिसे हम जीवन कहते हैं।
तांडव और लय का संदेश
शिव का तांडव केवल विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि सृजन के लिए आवश्यक परिवर्तन का संकेत है। वहीं पार्वती का लास्य कोमलता और सृजनशीलता का रूप है। दोनों मिलकर जीवन की लय रचते हैं। महाशिवरात्रि की रात इसी संतुलन को समझने का अवसर है। यह वह क्षण है जब व्यक्ति अपने भीतर झांककर देख सकता है कि जीवन का हर उतार-चढ़ाव एक बड़ी लय का हिस्सा है।
महाशिवरात्रि हमें याद दिलाती है कि सादगी में भी गहराई है, त्याग में भी शक्ति है और संतुलन में ही स्थायित्व है। शिव का स्मरण केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन को व्यापक दृष्टि से देखने का आमंत्रण है।



