Holashtak – 24 फरवरी से शुरू हुआ अशुभ काल, जानें मान्यताएं
Holashtak – राजधानी लखनऊ में होली को लेकर बाजारों में चहल-पहल तेज हो गई है। रंग, गुलाल, पिचकारी और त्योहार से जुड़ी वस्तुओं की खरीदारी में लोग जुटे हैं। लेकिन होली से आठ दिन पहले शुरू होने वाले होलाष्टक के कारण कई परिवार जरूरी निर्णय टालने की तैयारी भी कर रहे हैं। ज्योतिष गणना के अनुसार इस वर्ष होलाष्टक 24 फरवरी से आरंभ होकर तीन मार्च को होलिका दहन तक प्रभावी रहेगा। इस अवधि को परंपरागत रूप से शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।

ज्योतिषीय दृष्टि से क्यों खास हैं ये आठ दिन
आचार्य डॉ. प्रदीप द्विवेदी ‘रमण’ के अनुसार होलाष्टक का संबंध ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान कुछ प्रमुख ग्रहों की स्थिति उग्र मानी जाती है, जिससे मानसिक अस्थिरता या निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है। ज्योतिष शास्त्र में इसे सावधानी बरतने का समय बताया गया है। इसलिए लोग नए कार्य की शुरुआत, बड़े निवेश या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से बचते हैं। हालांकि यह परंपरा आस्था पर आधारित है और इसका पालन व्यक्तिगत विश्वास के अनुसार किया जाता है।
शुभ कार्यों पर रहती है रोक
होलाष्टक के दौरान विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, नामकरण संस्कार, मुंडन या नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य सामान्यतः टाल दिए जाते हैं। कई लोग वाहन या कीमती वस्तुओं की खरीदारी भी इस अवधि के बाद ही करना पसंद करते हैं। मान्यता है कि इस समय शुरू किया गया कार्य अपेक्षित सफलता नहीं देता या उसमें बाधाएं आ सकती हैं। इसी वजह से पंडित और ज्योतिषाचार्य इन आठ दिनों को संयम और धैर्य का काल बताते हैं।
पौराणिक कथा से जुड़ी है परंपरा
होलाष्टक की मान्यता का संबंध पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इन आठ दिनों में असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से हटाने के लिए अनेक कष्ट दिए थे। भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था और कठिन परीक्षा के इन दिनों को स्मरण करते हुए इसे तप और धैर्य का समय माना जाता है। इसी कारण इन दिनों को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं समझा जाता। होलिका दहन के साथ ही इस अवधि का समापन होता है और उसके बाद फिर से मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं।
बाजारों में रौनक, परंपराओं का भी ध्यान
हालांकि होलाष्टक लगने से शुभ कार्यों पर विराम रहता है, लेकिन त्योहार की तैयारियां जारी रहती हैं। बाजारों में रंग-बिरंगे उत्पादों की बिक्री बढ़ रही है। मिठाई की दुकानों पर भी भीड़ देखी जा रही है। परिवार होली के आयोजन की तैयारी करते हैं, लेकिन विवाह या बड़े आयोजनों की तिथि आगे बढ़ा देते हैं। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी बड़ी संख्या में लोग इसका पालन करते हैं।
व्यक्तिगत आस्था पर निर्भर है पालन
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं का पालन करना या न करना व्यक्ति की आस्था पर निर्भर करता है। कुछ लोग इसे पूरी श्रद्धा से मानते हैं, जबकि कुछ इसे परंपरा के रूप में देखते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी निर्णय से पहले विचार और संतुलन जरूरी है। होली का पर्व आपसी सौहार्द और उल्लास का प्रतीक है, और होलिका दहन के बाद से शुभ कार्यों का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।



