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Supreme Court:आधार कार्ड रखने वाला विदेशी क्या भारत में वोट डाल सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कड़ा सवाल

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देश के कई राज्यों में चल रहे वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर बड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि आधार कार्ड को कभी भी भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुआई वाली बेंच ने चुनाव आयोग की उस प्रक्रिया पर अंतिम सुनवाई शुरू की जिसमें हजारों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने का खतरा बना हुआ है।

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आधार कार्ड सिर्फ सुविधा के लिए, नागरिकता का सबूत नहीं

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि आधार कार्ड का मूल उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं का लाभ देना है। चीफ जस्टिस ने सीधा सवाल उठाया, “मान लीजिए कोई पड़ोसी देश का नागरिक भारत में मजदूरी करता है और उसे राशन या अन्य सुविधा के लिए आधार कार्ड दे दिया गया, तो क्या उसे वोट देने का अधिकार भी दे दिया जाए?” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म-6 में दी गई जानकारी सही है या नहीं, यह तय करने का पूरा अधिकार चुनाव आयोग को है।

चुनाव आयोग को “पोस्ट ऑफिस बनाने की मांग खारिज

कुछ याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि चुनाव आयोग को हर फॉर्म-6 को बिना जांचे स्वीकार कर लेना चाहिए, जैसे पोस्ट ऑफिस डाक स्वीकार करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग कोई डाकघर नहीं है जो बिना सत्यापन के हर आवेदन को मंजूरी दे दे। कोर्ट का मानना है कि वोटर लिस्ट की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियाद है और इसमें घुसपैठ की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

कपिल सिब्बल ने उठाया आम नागरिकों पर बोझ का मुद्दा

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी कि SIR प्रक्रिया आम नागरिकों पर अनावश्यक कागजी बोझ डाल रही है। खासकर गरीब, अशिक्षित और बुजुर्ग लोग दस्तावेज जुटाने में असमर्थ हैं, जिससे उनका नाम वोटर लिस्ट से कट सकता है। सिब्बल ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया। हालांकि कोर्ट ने कहा कि पहले कभी इस तरह का गहन रिवीजन न होने का तर्क चुनाव आयोग के अधिकार को कम नहीं कर सकता।

नाम हटाने से पहले नोटिस देना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया कि किसी भी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटाने से पहले उसे उचित नोटिस देना अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना मौका दिए नाम काटना संविधान के खिलाफ होगा। इस टिप्पणी से उन लाखों लोगों को राहत मिली है जिनके नाम SIR के दौरान हटाए जाने की आशंका थी।

तीन राज्यों के मामलों की अलग-अलग समय-सीमा तय

कोर्ट ने तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लिए अलग-अलग तारीखें तय की हैं।

  • तमिलनाडु की याचिका पर 4 दिसंबर को सुनवाई होगी, चुनाव आयोग को 1 दिसंबर तक जवाब देना है।
  • केरल की याचिका 2 दिसंबर को सुनी जाएगी।
  • पश्चिम बंगाल का मामला 9 दिसंबर को आएगा, जहां एक बूथ लेवल ऑफिसर की कथित आत्महत्या का मामला भी जुड़ा है।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए सख्ती जरूरी

यह पूरा मामला सिर्फ वोटर लिस्ट की सफाई का नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र को विदेशी घुसपैठ से बचाने का है। सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट है कि आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों का दुरुपयोग कर कोई गैर-नागरिक वोटिंग का अधिकार न ले सके। साथ ही, असली भारतीय नागरिकों के अधिकारों की भी पूरी रक्षा होनी चाहिए।

आने वाले दिनों में इस मामले पर अंतिम फैसला आने की संभावना है, जो आने वाले सभी चुनावों पर गहरा असर डालेगा।

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