Indian Medicines in Afghanistan 2026: अफगानिस्तान में चला भारतीय दवाओं का जादू, आधी कीमत में मिल रहा इलाज…
Indian Medicines in Afghanistan 2026: अफगानिस्तान के बाजारों में इन दिनों एक नई आर्थिक और मानवीय क्रांति की लहर दिखाई दे रही है। सोशल मीडिया पर फजल अफगान नामक एक प्रसिद्ध ब्लॉगर का अनुभव इस बदलाव की सबसे सटीक तस्वीर पेश करता है। फजल को अपने सिरदर्द के लिए तुर्की के एक ब्रांड की दवा खरीदनी थी जिसकी कीमत 40 अफगानी थी, लेकिन दुकानदार ने उन्हें (Indian Pharmaceutical Quality) पर भरोसा जताते हुए भारत में बनी वही दवा मात्र 10 अफगानी में दे दी। फजल का दावा है कि यह दवा न केवल चार गुना सस्ती थी, बल्कि इसका असर भी किसी महंगे विदेशी ब्रांड से कहीं ज्यादा तेज और प्रभावशाली रहा।

पाकिस्तानी दवाओं के साम्राज्य का पतन
पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान अपनी बुनियादी चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पूरी तरह से पाकिस्तान पर निर्भर रहा है। एक समय ऐसा था जब अफगान बाजारों में लगभग 80 प्रतिशत दवाएं पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से ही सप्लाई की जाती थीं। हालांकि, हाल के वर्षों में (Low Quality Medicine Issues) के चलते अफगान नागरिकों में भारी रोष देखा गया। पाकिस्तानी फार्मा कंपनियों पर आरोप लगे कि वे अफगानिस्तान में घटिया और एक्सपायर हो चुकी दवाओं की डंपिंग कर रहे हैं, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही थी।
सीमा विवाद और प्रतिबंध की कड़वाहट
अक्टूबर और नवंबर 2025 के बीच पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाओं पर हुए हिंसक संघर्ष ने कूटनीतिक रिश्तों को पूरी तरह बदल दिया। इस तनाव के बाद अफगानिस्तान के उप प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए पाकिस्तानी दवाओं के (Complete Trade Ban) की घोषणा कर दी। सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि घटिया पाकिस्तानी दवाओं के बजाय अब भारत, ईरान और मध्य एशियाई देशों से स्वास्थ्य संबंधी विकल्प तलाशे जाएंगे। तोरखम और चमन जैसे प्रमुख व्यापारिक मार्गों के बंद होने से पाकिस्तान की फार्मा इंडस्ट्री को करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ है।
संकट में मसीहा बनकर उभरा भारत
जब तालिबान प्रशासन और अफगान जनता दवाओं की भीषण किल्लत से जूझ रहे थे, तब भारत ने एक बार फिर अपनी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की नीति का परिचय दिया। नवंबर 2025 में भारत सरकार ने मानवीय आधार पर लगभग 73 टन जीवन रक्षक दवाओं की एक विशाल खेप काबुल पहुंचाई। इस (Humanitarian Aid to Afghanistan) ने अफगान नागरिकों के दिलों में भारत के लिए सम्मान और भी बढ़ा दिया है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद वह अफगानिस्तान की आम जनता की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहेगा।
निर्यात के आंकड़ों में जबरदस्त उछाल
भारत और अफगानिस्तान के बीच फार्मा व्यापार अब नए रिकॉर्ड बना रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 108 मिलियन डॉलर मूल्य की दवाएं अफगानिस्तान भेजी थीं। लेकिन 2025 के आखिरी कुछ महीनों की (Global Pharma Export Trends) ने सबको चौंका दिया, क्योंकि महज तीन महीनों में ही यह आंकड़ा 100 मिलियन डॉलर के पार पहुंच गया। यह दर्शाता है कि अब अफगान फार्मासिस्ट और आम लोग पाकिस्तानी या अन्य विदेशी ब्रांड्स के मुकाबले ‘मेड इन इंडिया’ लेबल पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।
काबुल में भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
भारत केवल दवाएं भेजकर ही अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहा, बल्कि अफगानिस्तान के स्वास्थ्य ढांचे को जड़ से मजबूत बनाने में भी जुटा है। काबुल में स्थित 400 बिस्तरों वाला इंदिरा गांधी चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल भारत की (Healthcare Infrastructure Development) का सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण है। इस अस्पताल के माध्यम से हजारों अफगान बच्चों को मुफ्त और उच्च स्तरीय इलाज मिल रहा है। इसके अलावा भी भारत कई छोटे क्लिनिक और स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण में तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है।
जाइडस लाइफसाइंसेज की ऐतिहासिक मेगा डील
भारतीय फार्मा सेक्टर की दिग्गज कंपनी जाइडस लाइफसाइंसेज ने अफगानिस्तान के भविष्य को बदलने वाली एक बड़ी डील साइन की है। नवंबर 2025 में जाइडस और अफगानिस्तान के रोफी इंटरनेशनल ग्रुप के बीच 100 मिलियन डॉलर का (Pharmaceutical Joint Venture) समझौता हुआ। इस समझौते के तहत शुरुआती चरण में दवाओं का बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाएगा, लेकिन इसका दीर्घकालिक लक्ष्य अफगानिस्तान की धरती पर ही आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित करना है। यह कदम अफगानिस्तान को भविष्य में दवाओं के लिए आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
तकनीक हस्तांतरण से बदलेगी सूरत
जाइडस लाइफसाइंसेज और अफगान कंपनियों के बीच हुआ यह करार केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। भारत अब अफगानिस्तान को दवा बनाने की उन्नत तकनीक यानी (Technology Transfer in Pharmacy) भी प्रदान करेगा। इससे अफगानिस्तान में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी। तकनीक साझा करने की भारत की यह उदारता उसे पाकिस्तान जैसे देशों से अलग खड़ा करती है, जो केवल अफगानिस्तान को एक बाजार के रूप में देखते आए हैं।
आत्मनिर्भर अफगानिस्तान की ओर बढ़ते कदम
भारतीय दवाओं की उपलब्धता ने अफगानिस्तान में स्वास्थ्य सेवाओं को न केवल सुलभ बनाया है बल्कि किफायती भी कर दिया है। जब स्थानीय स्तर पर दवाओं का उत्पादन शुरू होगा, तो (Affordable Healthcare Solutions) की दिशा में यह एक बड़ी कामयाबी होगी। भारत के सहयोग से अब अफगानिस्तान अपनी जरूरतों के लिए किसी एक मुल्क का मोहताज नहीं रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह सक्रियता मध्य एशिया में उसके प्रभाव को और भी मजबूत करेगी और क्षेत्रीय स्थिरता में मदद करेगी।
भारत-अफगान दोस्ती का नया अध्याय
अंततः यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान की स्वार्थी नीतियों ने उसे अफगानिस्तान के बाजार से बाहर कर दिया है, जबकि भारत की निस्वार्थ मदद ने उसे एक विश्वसनीय भागीदार बना दिया है। (Bilateral Trade Relations) का यह नया दौर दोनों देशों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। अफगान जनता अब समझ चुकी है कि उनका सच्चा दोस्त कौन है, जो न केवल मुसीबत में दवाएं भेजता है बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना भी सिखाता है।



