झारखण्ड

Human Elephant Conflict Jharkhand: इधर हाथियों ने ढहाया आशियाना और उधर सिस्टम ने तोड़ा दम, महिला k

Human Elephant Conflict Jharkhand: झारखंड के गढ़वा जिले से आई एक हृदयविदारक घटना ने इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष की रूह कंपा देने वाली तस्वीर पेश की है। चिनीयां थाना क्षेत्र के चिरका गांव में जंगली हाथियों के एक झुंड ने देर रात भारी तबाही मचाई, जिसमें 50 वर्षीय गीता देवी की जान चली गई। यह केवल एक (Wild Animal Attacks) की घटना नहीं है, बल्कि उस बेबसी की दास्तां है जहां एक पति अपनी आंखों के सामने पत्नी को मौत के मुंह में जाते देखता रहा और चाहकर भी कुछ न कर सका।

Human Elephant Conflict Jharkhand
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कच्चे घर पर काल बनकर टूटे गजराज

आमाटोली टोले में रहने वाले प्रभु कोरवा के परिवार के लिए वह रात किसी कयामत से कम नहीं थी। जब पूरा गांव गहरी नींद में था, तब हाथियों के झुंड ने अचानक उनके कच्चे घर पर हमला बोल दिया। मिट्टी की दीवारें गिरते ही मचे (Elephant Herd Rampage) के बीच प्रभु कोरवा किसी तरह बाहर निकलने में सफल रहे। उन्होंने अंधेरे में अपनी पत्नी गीता देवी को बार-बार पुकारा, लेकिन दीवारों के मलबे और हाथियों की चिंघाड़ के बीच गीता देवी बाहर नहीं निकल पाईं और हाथियों ने उन्हें कुचल दिया।

सिस्टम की विफलता और दो किलोमीटर का पैदल संघर्ष

इंसान की मौत के बाद भी उसकी गरिमा का ख्याल न रख पाना हमारे सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता है। सड़क न होने के कारण पुलिस और वन विभाग की गाड़ियां घटनास्थल तक नहीं पहुंच सकीं। ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर था क्योंकि (Lack of Rural Roads) की वजह से प्रशासन का कोई नुमाइंदा मौके पर नहीं पहुंच पाया। अंततः ग्रामीणों को खुद ही शव को चादर में लपेटना पड़ा और दुर्गम रास्तों पर करीब दो किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा।

नदी पार और कंधे पर लाश का बोझ

शव को मुख्य मार्ग तक लाना किसी चुनौती से कम नहीं था, क्योंकि रास्ते में नदी और पथरीली जमीन थी। स्थानीय लोगों ने पहले नाव के जरिए शव को नदी के उस पार पहुंचाया और फिर भारी मन से (Manual Dead Body Carrying) करते हुए उसे चिरका डैम हाथी टावर तक लेकर आए। एक तरफ हाथियों का डर था और दूसरी तरफ अपनों को अंतिम विदाई दिलाने की जद्दोजहद, जिसने शासन-प्रशासन के विकास के दावों की पोल खोलकर रख दी।

आक्रोशित ग्रामीण और घंटों चला पंचनामा

सुबह से ही घटनास्थल पर सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई थी, जो वन विभाग की सुस्ती और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर बेहद नाराज थे। सुबह 11 बजे जब शव को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया, तब कहीं जाकर (Police Investigation Process) शुरू हो सकी। चिनीयां थाना प्रभारी अमित कुमार ने ग्रामीणों को शांत कराया और शव का पंचनामा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए गढ़वा जिला अस्पताल भेजा, तब जाकर माहौल थोड़ा शांत हुआ।

मुआवजे का मरहम और वन विभाग का आश्वासन

मौके पर पहुंचे वन विभाग के प्रतिनिधि अनिमेष कुमार ने पीड़ित परिवार की व्यथा को सुना और तत्काल राहत के तौर पर 50 हजार रुपये की नकद सहायता प्रदान की। विभाग ने वादा किया है कि (Wildlife Damage Compensation) के तहत कागजी कार्रवाई पूरी होते ही गिरे हुए मकान और जान के नुकसान के बदले शेष 3.5 लाख रुपये की राशि दी जाएगी। हालांकि, परिजनों के लिए यह आर्थिक मदद उस खालीपन को नहीं भर सकती जो गीता देवी के जाने से पैदा हुआ है।

दहशत के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण

गढ़वा के इन सुदूर इलाकों में जंगली हाथियों का आतंक कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर बार होने वाली जनहानि प्रशासन की नींद नहीं उड़ा पाती। ग्रामीणों का कहना है कि (Forest Department Monitoring) की कमी के कारण हाथी अक्सर रिहायशी इलाकों में घुस आते हैं। जब तक हाथियों को भगाने या उनके लिए कॉरिडोर बनाने की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं होती, तब तक इन गांवों के ऊपर मौत का साया इसी तरह मंडराता रहेगा।

क्या अब जागेगा सोता हुआ प्रशासन?

इस दुखद घटना ने न केवल वन्यजीव प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं, बल्कि गांव की कनेक्टिविटी के दावों पर भी तमाचा जड़ा है। जिस राज्य में (Government Social Welfare) की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, वहां एक शव को दो किलोमीटर तक कंधे पर ढोना शर्मनाक है। उम्मीद है कि गीता देवी की यह दर्दनाक मौत प्रशासन की आंखें खोलेगी और भविष्य में किसी और परिवार को इस तरह के ‘सिस्टम जनित’ दर्द से नहीं गुजरना पड़ेगा।

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