झारखण्ड

Dhanbad Gas Leak Tragedy: मौत बनकर बरस रही है जहरीली गैस, धनबाद का केंदुआडीह बन जाएगा दूसरा भोपाल

Dhanbad Gas Leak Tragedy: झारखंड के धनबाद जिले से एक ऐसी हृदयविदारक खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे कोयलांचल को गहरे सदमे में डाल दिया है। केंदुआडीह के गैस प्रभावित क्षेत्र में जहरीली गैस का रिसाव थमने का नाम नहीं ले रहा है और अब इसने एक और बेगुनाह की जान ले ली है। देर रात अचानक हुई इस घटना ने स्थानीय निवासियों के बीच (Environmental Health Hazards) को लेकर एक नया खौफ पैदा कर दिया है। लोग अब अपने ही घरों में सांस लेने से डर रहे हैं, क्योंकि हवा में घुला यह धीमा जहर कब किसकी सांसें रोक दे, कोई नहीं जानता।

Dhanbad Gas Leak Tragedy
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आधी रात को बिगड़ी तबीयत और अस्पताल में पसरा मातम

घटना केंदुआडीह थाना क्षेत्र के न्यू दौड़ा इलाके की है, जहां सुरेंद्र सिंह नामक व्यक्ति अपने परिवार के साथ सो रहे थे। अचानक गैस के प्रभाव के कारण उनकी स्थिति बिगड़ने लगी और उन्हें सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगी। आनन-फानन में परिजन उन्हें इलाज के लिए शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज (Hospital Emergency Care) ले गए, लेकिन दुर्भाग्य से समय ने उनका साथ नहीं दिया। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने जांच के उपरांत उन्हें मृत घोषित कर दिया, जिसके बाद अस्पताल परिसर परिजनों के करुण क्रंदन से गूंज उठा।


जनता मजदूर संघ के सक्रिय सदस्य थे मृतक सुरेंद्र सिंह

मृतक सुरेंद्र सिंह केवल एक आम नागरिक ही नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय स्तर पर मजदूरों की आवाज बुलंद करने वाले (Labor Union Activist) के रूप में भी पहचाने जाते थे। वे जनता मजदूर संघ के सक्रिय सदस्य थे और हमेशा लोगों की मदद के लिए तत्पर रहते थे। उनकी असामयिक मृत्यु ने न केवल उनके परिवार को अनाथ कर दिया है, बल्कि मजदूर संगठन के लिए भी यह एक अपूरणीय क्षति है। उनके सहयोगियों का कहना है कि सुरेंद्र लंबे समय से गैस प्रभावित क्षेत्रों में रह रहे लोगों के पुनर्वास की मांग कर रहे थे।


पूर्व विधायक संजीव सिंह ने अस्पताल पहुंचकर साझा किया दुख

सुरेंद्र सिंह के निधन की खबर मिलते ही झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह तुरंत शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज पहुंचे। उन्होंने शोकाकुल परिजनों से मुलाकात की और इस दुख की घड़ी में उन्हें ढांढस बंधाया। संजीव सिंह ने इस घटना पर (Political Accountability) की जरूरत बताते हुए गहरा शोक व्यक्त किया और कहा कि गैस प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि मृतक के परिवार को उचित मुआवजा दिया जाए और क्षेत्र में गैस रिसाव को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।


गैस प्रभावित क्षेत्रों में नरक जैसी होती जिंदगी

धनबाद के केंदुआडीह और आसपास के इलाकों में भूमिगत आग और उससे निकलने वाली गैसों ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है। यहाँ रहने वाले हजारों परिवार हर पल (Toxic Gas Exposure) के खतरे के बीच अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। जमीन के अंदर सुलगती आग से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसें फेफड़ों को धीरे-धीरे छलनी कर रही हैं। सुरेंद्र सिंह की मौत इस बात का प्रमाण है कि यदि समय रहते इन क्षेत्रों का वैज्ञानिक समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले दिनों में मौतों का आंकड़ा और भी डरावना हो सकता है।


पुनर्वास योजनाओं की कछुआ चाल और बढ़ता खतरा

सरकार और बीसीसीएल प्रबंधन द्वारा झरिया और धनबाद के अग्नि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजने के लिए (Rehabilitation Project Challenges) का हवाला दिया जाता रहा है। लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि पुनर्वास की योजनाएं कछुआ चाल से चल रही हैं। आज भी न्यू दौड़ा जैसे इलाकों में लोग विस्थापन के डर और मौत के साये के बीच रहने को मजबूर हैं। बुनियादी सुविधाओं के अभाव और असुरक्षित वातावरण ने यहाँ के नागरिकों को मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जहाँ प्रशासन की सुस्ती जानलेवा साबित हो रही है।


क्या प्रशासन जागेगा या और भी होंगे ऐसे हादसे?

सुरेंद्र सिंह की मौत ने एक बार फिर धनबाद जिला प्रशासन और संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोग लगातार शिकायत कर रहे हैं कि गैस रिसाव (Public Safety Measures) के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। गैस रिसाव वाले संवेदनशील बिंदुओं को सही तरीके से सील नहीं किया गया है, जिसके कारण बारिश और ठंड के मौसम में गैस का जमाव जमीन की सतह के करीब हो जाता है। नागरिकों का गुस्सा अब फूटने लगा है और वे स्थाई समाधान के बिना शांत होने को तैयार नहीं हैं।


केंदुआडीह की हवाओं में घुला है विस्थापन का दर्द

केंदुआडीह के लोगों के लिए यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह एक (Socio Economic Struggle) की दास्तां भी है। यहाँ के निवासी अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहते, लेकिन जहरीली हवा उन्हें वहाँ रहने भी नहीं दे रही है। सुरेंद्र सिंह जैसे समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौत व्यवस्था के गाल पर एक तमाचा है। अब देखना यह होगा कि इस ताजा हादसे के बाद क्या बीसीसीएल और प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या फिर किसी अगली मौत के इंतजार में फाइलों को घुमाते रहते हैं।

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