NATO – ट्रंप की नाराज़गी के बीच गठबंधन पर फिर उठे सवाल
NATO – ईरान को लेकर बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के रिश्तों में खिंचाव साफ दिखाई देने लगा है। पिछले एक महीने में हालात ऐसे बने कि जहां एक ओर अमेरिका और इज़राइल की कार्रवाई के जवाब में ईरान ने प्रतिक्रिया दी, वहीं दूसरी ओर अमेरिका को उम्मीद के मुताबिक अपने पारंपरिक सहयोगियों का साथ नहीं मिला। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर नाटो जैसे बड़े सैन्य गठबंधन की भूमिका और प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है।

सहयोगियों की दूरी ने बढ़ाई अमेरिका की चिंता
ईरान के खिलाफ कार्रवाई के दौरान यह माना जा रहा था कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो नाटो और यूरोपीय देश अमेरिका के साथ खड़े होंगे। लेकिन वास्तविकता इससे अलग रही। कई देशों ने साफ तौर पर इस संघर्ष से दूरी बनाए रखी और इसे अमेरिका की पहल बताया। इस रुख ने वाशिंगटन को असहज कर दिया है। खासकर तब, जब अमेरिका लंबे समय से खुद को इस गठबंधन का प्रमुख स्तंभ मानता रहा है।
ट्रंप का सख्त रुख और सार्वजनिक नाराज़गी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी नाराज़गी जताई है। उन्होंने नाटो की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए इसे कमजोर संगठन तक बताया। हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने यहां तक संकेत दिए कि अमेरिका इस गठबंधन से बाहर निकलने के विकल्प पर विचार कर सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक सुरक्षा संतुलन पहले से ही संवेदनशील स्थिति में है।
नाटो क्या है और क्यों बना था
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन, यानी नाटो, 1949 में स्थापित एक सामूहिक रक्षा गठबंधन है। इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में स्थिरता बनाए रखना और सोवियत संघ के प्रभाव को सीमित करना था। शुरुआत में इसमें 12 देश शामिल थे, लेकिन समय के साथ इसका विस्तार होता गया और अब इसमें 32 सदस्य देश हैं।
सदस्य देशों की भूमिका और आर्टिकल 5
नाटो का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत आर्टिकल 5 है, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। इसका मतलब है कि सभी सदस्य देश मिलकर जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। हालांकि, इस सिद्धांत का व्यवहारिक उपयोग परिस्थितियों और सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छा पर भी निर्भर करता है।
रक्षा खर्च को लेकर लगातार विवाद
ट्रंप का मुख्य आरोप यह रहा है कि कई यूरोपीय देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे हैं। नाटो के दिशा-निर्देश के अनुसार सदस्य देशों को अपने जीडीपी का कम से कम 2 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करना चाहिए। अमेरिका का दावा है कि वह इस गठबंधन का बड़ा वित्तीय बोझ उठाता है, जिससे असंतुलन पैदा होता है।
क्या अमेरिका वास्तव में नाटो छोड़ सकता है
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका का नाटो से बाहर निकलना आसान नहीं है। इसके लिए केवल राष्ट्रपति का निर्णय पर्याप्त नहीं होगा। अमेरिकी कानून के तहत ऐसे किसी भी कदम के लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत या कांग्रेस की मंजूरी जरूरी है। इसके अलावा, यह मामला अदालत तक भी जा सकता है, क्योंकि नाटो एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संधि पर आधारित संगठन है।
‘चुपचाप दूरी’ भी बन सकता है विकल्प
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि औपचारिक रूप से नाटो छोड़ना कठिन होने के बावजूद अमेरिका अपनी भूमिका सीमित कर सकता है। यानी वह गठबंधन का हिस्सा बना रहे, लेकिन सैन्य और आर्थिक योगदान कम कर दे। इससे नाटो की प्रभावशीलता पर सीधा असर पड़ सकता है।
बदलते वैश्विक समीकरणों में नाटो की परीक्षा
वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि नाटो एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी एकजुटता और प्रासंगिकता दोनों की परीक्षा हो रही है। अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच बढ़ती दूरी भविष्य में वैश्विक सुरक्षा ढांचे को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में यह गठबंधन खुद को कैसे ढालता है।



