MiddleEastWar – ईरान संघर्ष में अमेरिका को सीमित समर्थन, सहयोगी दूरी पर
MiddleEastWar – ईरान, अमेरिका और इस्राइल के बीच जारी संघर्ष को तीन सप्ताह के करीब समय हो चुका है, लेकिन इस दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित समर्थन अमेरिका को नहीं मिल पाया है। हालात यह हैं कि प्रमुख सहयोगी देश सीधे तौर पर इस सैन्य टकराव में शामिल होने से बच रहे हैं। इस बीच दोनों पक्षों के बीच हमले जारी हैं और क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में इस्राइल द्वारा ईरान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी को निशाना बनाए जाने की पुष्टि के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है।

यूरोपीय देशों ने बनाई दूरी
यूरोप के प्रमुख देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली इस संघर्ष में खुलकर अमेरिका का साथ देने से पीछे हटते नजर आए हैं। इन देशों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वे इस युद्ध को लेकर सावधानी बरत रहे हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के नजरिए से देख रहे हैं। जर्मनी के रक्षा मंत्री ने साफ कहा कि यह संघर्ष उनका नहीं है और वे इसमें शामिल नहीं होना चाहते। वहीं स्पेन ने तो अमेरिकी फैसले की खुली आलोचना करते हुए अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति भी नहीं दी।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर सहयोग को लेकर चुप्पी
अमेरिका की ओर से सहयोगी देशों से होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने के लिए नौसैनिक मदद मांगी गई थी, लेकिन इस पर भी ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली। कई देशों ने या तो इससे दूरी बनाए रखी या कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है, ऐसे में इसकी सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बनी हुई है।
एशियाई देशों की अपनी चिंताएं
एशिया के कई देशों ने भी इस युद्ध में शामिल होने से परहेज किया है। जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों का मानना है कि यह एक दूरस्थ संघर्ष है, जिसमें शामिल होना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है। जापान में जनमत भी इस युद्ध के खिलाफ बताया जा रहा है, जबकि दक्षिण कोरिया में श्रमिक संगठनों ने संभावित सैन्य सहयोग का विरोध किया है। इन देशों की प्राथमिकता फिलहाल अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों को सुरक्षित रखना है।
नाटो की भूमिका पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में नाटो की निष्क्रियता भी चर्चा का विषय बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि नाटो एक रक्षात्मक गठबंधन है, जिसका उद्देश्य किसी एक देश द्वारा शुरू किए गए युद्ध में स्वतः शामिल होना नहीं है। पूर्व सैन्य अधिकारियों और विश्लेषकों का कहना है कि इस मामले में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया भी कमजोर नजर आई है, जिससे गठबंधन की भूमिका सीमित रह गई है।
सीमित दायरे में सहयोग के उदाहरण
हालांकि कुछ देशों ने अपने हितों की रक्षा के लिए सीमित कदम जरूर उठाए हैं। ब्रिटेन ने स्पष्ट किया है कि वह युद्ध का हिस्सा नहीं बनेगा, लेकिन अपने ठिकानों और सहयोगियों की सुरक्षा के लिए कुछ सैन्य संसाधन तैनात किए हैं। फ्रांस ने भी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ाई है, जिसका उद्देश्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ऑस्ट्रेलिया ने भी क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, लेकिन इसे पूरी तरह रक्षात्मक कदम बताया है।
अमेरिका के विरोध में कुछ देश
इस संघर्ष में रूस और चीन जैसे देशों ने अमेरिका और इस्राइल के रुख का विरोध किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, रूस ईरान को खुफिया सहायता दे रहा है, जबकि चीन ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताई है। इसके अलावा ब्राजील, मैक्सिको और कोलंबिया जैसे देशों ने भी संघर्ष विराम की मांग करते हुए इस स्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने पर जोर दिया है।
तटस्थ रुख अपनाने वाले देश
भारत, तुर्किये और पाकिस्तान जैसे देश इस पूरे घटनाक्रम में संतुलित रुख अपनाते दिख रहे हैं। ये देश न तो सीधे तौर पर इस संघर्ष में शामिल हो रहे हैं और न ही किसी पक्ष का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। इनकी प्राथमिकता अपने आर्थिक हितों, खासकर ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखना है।
बढ़ते तनाव के बीच कूटनीति की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत है। जिस तरह से सहयोगी देश दूरी बना रहे हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर इस संघर्ष को लेकर व्यापक समर्थन नहीं है। ऐसे में बातचीत और समझौते के जरिए ही स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।



