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Iran Protest US Tension: धधकते तेहरान में ट्रंप ने मारी एंट्री, ईरान ने भी दे डली विनाशकारी युद्ध की चेतावनी

Iran Protest US Tension: ईरान की सड़कों पर इन दिनों सामान्य शांति नहीं, बल्कि एक गहराता हुआ आर्थिक असंतोष तैर रहा है। देश की मुद्रा ‘रियाल’ की कीमतों में आई ऐतिहासिक गिरावट ने आम नागरिक की कमर तोड़ दी है, जहां (Economic Instability Iran) अब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 14 लाख रियाल तक जा पहुंची है। इस वित्तीय संकट ने दुकानदारों, व्यापारियों और छात्रों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। लोग अपनी आजीविका और बढ़ती महंगाई के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे हैं, लेकिन यही प्रदर्शन अब एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक युद्ध का केंद्र बन गए हैं।

Iran Protest US Tension
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ट्रंप की सोशल मीडिया चेतावनी से भड़की आग

जब ईरान अपने आंतरिक आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने बारूद में चिंगारी का काम किया। ट्रंप ने (Truth Social Warning) पर साफ तौर पर लिखा कि अगर ईरान की सरकार अपने ही शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाती है या उन्हें नुकसान पहुंचाती है, तो अमेरिका मूकदर्शक नहीं बना रहेगा। ट्रंप ने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति में अमेरिका प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए सक्रिय रूप से आगे आएगा और सैन्य कार्रवाई के लिए भी तैयार रहेगा। इस बयान ने तेहरान के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

तेहरान का पलटवार: संप्रभुता से खिलवाड़ नहीं होगा

ईरानी सरकार ने ट्रंप की टिप्पणियों को न केवल गैर-जिम्मेदाराना बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करार दिया है। तेहरान ने एक कड़े (Sovereignty and Intervention) संदेश में कहा कि उनके देश का इतिहास गवाह है कि ईरान के लोग कभी भी बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करते। सरकार का मानना है कि ट्रंप का यह बयान उन तत्वों से प्रेरित है जो कूटनीति के बजाय युद्ध को प्राथमिकता देते हैं। ईरान ने दो टूक कहा कि उसे पता है कि अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए कब, कहां और कैसे जवाब देना है।

अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब ‘वैध लक्ष्य’

ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर ग़ालिबफ़ ने अमेरिका को अब तक की सबसे सीधी और घातक चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका ने (Targeting US Bases) किसी भी तरह का सैन्य दुस्साहस करने की कोशिश की, तो खाड़ी क्षेत्र और उसके आसपास मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकाने और बल ईरान की मिसाइलों के वैध लक्ष्य होंगे। ग़ालिबफ़ का यह बयान दर्शाता है कि ईरान किसी भी संभावित हमले की स्थिति में अपनी पूरी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा, जिससे पूरे क्षेत्र में तबाही फैल सकती है।

दंगों और विरोध के बीच का महीन अंतर

ईरानी प्रशासन ने यह स्पष्ट किया है कि वे अपने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हैं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को अनुमति दी गई है। हालांकि, कुछ इलाकों में (Violent Unrest Incidents) पुलिस थानों पर हमले और सुरक्षाबलों पर मोलोटोव कॉकटेल फेंकने जैसी घटनाएं भी हुई हैं। सरकार का आरोप है कि विदेशी खुफिया एजेंसियां इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक दंगों में बदलने की साजिश रच रही हैं। स्पीकर ग़ालिबफ़ ने कहा कि जनता की सतर्कता ने इन विदेशी साजिशों को नाकाम कर दिया है और असली व्यापारी कभी हिंसा नहीं करेंगे।

राष्ट्रपति पेजेशकियान की भावनात्मक अपील

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने देश के बिगड़ते हालात पर बेहद संवेदनशील और धार्मिक दृष्टिकोण साझा किया है। उन्होंने (Presidential Response Iran) राजकीय टीवी पर दिए अपने संबोधन में कहा कि अगर सरकार लोगों की आजीविका की समस्याओं को हल करने में विफल रहती है, तो इस्लामी मान्यताओं के अनुसार वे नर्क के भागी होंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पश्चिमी प्रतिबंधों और गिरते रियाल के कारण उनके पास विकल्प बहुत सीमित हैं। उनकी यह स्वीकारोक्ति देश के भीतर बढ़ते दबाव और लाचारी को बयां करती है।

प्रतिबंधों का बोझ और युद्ध की विभीषिका

ईरान की अर्थव्यवस्था वर्षों से कड़े अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के नीचे दबी हुई है, जो मुख्य रूप से उसके परमाणु कार्यक्रम के कारण लगाए गए हैं। जून में इस्राइल के साथ हुए 12 दिवसीय (International Sanctions Impact) संघर्ष ने वित्तीय स्थिति को और भी नाजुक बना दिया है। सर्दियों की छुट्टियों के बहाने देश को बंद रखना और बढ़ते सैन्य तनाव ने विदेशी निवेश और व्यापार की सभी संभावनाओं को लगभग खत्म कर दिया है। अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह तनाव बातचीत से सुलझेगा या फिर एक नया मोर्चा खुल जाएगा।

क्षेत्रीय शांति पर मंडराते काले बादल

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता यह वाकयुद्ध केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहने वाला है। अगर संघर्ष की स्थिति पैदा होती है, तो इसका असर (Global Oil Supply) और वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर पड़ेगा। ट्रंप का कड़ा रुख और ईरान की ‘ईंट का जवाब पत्थर से देने’ की नीति ने मध्य-पूर्व को एक ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि ट्रंप की ‘कार्रवाई की तैयारी’ महज एक कूटनीतिक दबाव है या फिर अमेरिका वास्तव में ईरान के भीतर किसी बड़े बदलाव की भूमिका लिख रहा है।

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