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Iran Crisis 2026: ईरान में खूनी संग्राम, मौत का तांडव और सत्ता की कुर्सी पर मंडराते काले बादल

Iran Crisis 2026: ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे काले दौर से गुजर रहा है जहाँ विरोध की चिंगारी अब एक भीषण दावानल का रूप ले चुकी है। सरकारी आंकड़ों और जमीनी रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुरक्षा बलों की बर्बर कार्रवाई के कारण अब तक लगभग 5,000 प्रदर्शनकारियों की जान जा चुकी है, जो (Human Rights Violations) की रूह कँपा देने वाली तस्वीर पेश करता है। सड़कों पर पसरा सन्नाटा और गोलियों की गूँज यह बताने के लिए काफी है कि वहाँ की जनता और प्रशासन के बीच की खाई अब पाटी नहीं जा सकती।

Iran Crisis 2026
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राष्ट्रपति की अमेरिका को दो टूक चेतावनी

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कड़ा रुख अपनाते हुए सीधे तौर पर अमेरिका को आगाह किया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से स्पष्ट किया कि यदि ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली खमनेई पर किसी भी प्रकार का हमला हुआ, तो इसे (Declaration of Total War) माना जाएगा। राष्ट्रपति ने अपने संदेश में जोर देकर कहा कि किसी भी अन्यायपूर्ण आक्रमण का जवाब अत्यंत कठोर और गंभीर होगा, जो पूरे क्षेत्र की शांति को भंग कर सकता है।

ट्रंप और इस्राइल पर मढ़ा अशांति का दोष

ईरानी प्रशासन ने देश के भीतर जारी इस भारी उथल-पुथल के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ होने का दावा किया है। सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इन दंगों का मुख्य सूत्रधार बताया है। उनका मानना है कि अशांति फैलाने वाले प्रदर्शनकारियों को (Foreign Intelligence Agencies) द्वारा प्रशिक्षित और भर्ती किया गया था। जहाँ एक तरफ ट्रंप ने 800 कैदियों की फांसी रुकने पर खुशी जताई, वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता में हस्तक्षेप मान रहा है।

जब हैकर्स ने हिला दी सरकारी टीवी की नींव

ईरान की सरकारी मशीनरी उस समय दंग रह गई जब देश के आधिकारिक टेलीविजन चैनलों को एक विरोधी समूह ने अपने नियंत्रण में ले लिया। कुछ समय के लिए प्रसारित हुए इन दृश्यों में न केवल विरोध प्रदर्शनों के फुटेज दिखाए गए, बल्कि निर्वासित राजकुमार रेजा पहलवी का ओजस्वी संदेश भी (Anti Government Protests) के प्रतीक के रूप में चलाया गया। इस हैकिंग ने साफ कर दिया कि प्रदर्शनकारियों की पहुँच अब सत्ता के डिजिटल गलियारों तक हो चुकी है।

निर्वासित राजकुमार की स्वदेश वापसी की हुंकार

वर्षों से देश के बाहर रह रहे राजकुमार रेजा पहलवी ने वर्तमान संकट को ‘अधिकार और मुक्ति’ के बीच का महासंग्राम बताया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से घोषणा की है कि वे जल्द ही अपनी मातृभूमि वापस लौटेंगे ताकि (Democratic Transition in Iran) के आंदोलन को सही दिशा और नेतृत्व प्रदान कर सकें। उनके इस बयान ने प्रदर्शनकारियों के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार किया है, जबकि सरकार के लिए यह नई चुनौती बन गई है।

डिजिटल ब्लैकआउट और दुनिया से कटता ईरान

ईरान सरकार ने सूचनाओं के प्रवाह को रोकने के लिए देशव्यापी इंटरनेट बंदी का सहारा लिया है, जिससे आम नागरिक पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए हैं। हालांकि हाल के दिनों में कुछ इलाकों में मोबाइल सेवाओं को बहाल किया गया है, लेकिन यह (Internet Censorship Policies) के तहत इतनी अधिक फिल्टर की गई हैं कि लोग सोशल मीडिया का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। यह डिजिटल दीवार दुनिया को ईरान के भीतर हो रहे असली नरसंहार को देखने से रोकने की एक सोची-समझी कोशिश है।

व्हाइट हाउस की पैनी नजर और सैन्य विकल्प

अमेरिका ने ईरान के ताजा हालातों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए साफ कर दिया है कि वह मूकदर्शक बनकर नहीं रहेगा। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ईरान पर कार्रवाई के लिए (International Sanctions and Military Options) पूरी तरह खुले हैं। अमेरिकी सेना की बढ़ती सक्रियता और रक्षा मंत्रालय के बयानों ने तेहरान की धड़कनें बढ़ा दी हैं, जिससे युद्ध की आशंका और अधिक प्रबल हो गई है।

तेहरान की गलियों में पसरी अनिश्चित शांति

राजधानी तेहरान और अन्य प्रमुख शहरों में भारी पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती की गई है। सड़कों पर दिखने वाली शांति केवल एक छलावा मात्र है, क्योंकि भीतर ही भीतर (Social Unrest and Instability) का लावा उबल रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे इस समय असमंजस की स्थिति में हैं और हर पल इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का अगला कदम क्या होगा।

भारतीय छात्रों की आपबीती और दहशत का मंजर

ईरान में शिक्षा ग्रहण कर रहे हजारों भारतीय छात्रों के लिए पिछला कुछ समय किसी डरावने सपने से कम नहीं था। भारत लौटी एक छात्रा ने बताया कि वहां का माहौल इतना तनावपूर्ण था कि वे (Evacuation of Indian Students) की उम्मीद खो चुके थे। इंटरनेट बंद होने के कारण वे अपने परिजनों से संपर्क नहीं कर पा रहे थे, जिससे उनकी चिंता बढ़ गई थी। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अनुसार, अब भी वहां हजारों भारतीय मौजूद हैं जिनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

महंगाई की मार से शुरू हुआ यह राजनीतिक तूफान

दिलचस्प बात यह है कि इस महा-आंदोलन की शुरुआत केवल आर्थिक मुद्दों को लेकर हुई थी। 28 दिसंबर को जब लोग महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह (Economic Crisis to Political Revolution) में तब्दील हो जाएगा। महज दो हफ्तों के भीतर लोगों का गुस्सा व्यवस्था परिवर्तन की मांग में बदल गया, जिसने आज पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति में भूचाल ला दिया है।

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