China-Japan Relations Tension 2026: ड्रैगन और उगते सूरज के देश में बढ़ा टकराव, आरोपों ने बदली एशिया की कूटनीति
China-Japan Relations Tension 2026: एशिया की दो महाशक्तियों, चीन और जापान के बीच दशकों पुराना विवाद इस शुक्रवार को एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। टोक्यो में तैनात चीन के राजदूत द्वारा जापान की निर्यात प्रतिबंधों को हटाने की मांग ठुकराने के बाद दोनों देशों के बीच (Geopolitical tensions in Asia) चरम पर हैं। जापान का आरोप है कि इस आपसी खींचतान की वजह से उसके कृषि उत्पादों और समुद्री खाद्य पदार्थों की खेपें चीन की सीमाओं पर जानबूझकर रोकी जा रही हैं। यह विवाद अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे तौर पर व्यापार और आर्थिक हितों पर चोट कर रहा है।

स्लीपर सेल और ‘दोहरे इस्तेमाल’ की वस्तुओं पर पाबंदी
चीन ने जापान के प्रति अपनी नाराजगी को आधिकारिक अमली जामा पहनाते हुए निर्यात के नए नियम लागू कर दिए हैं। चीन का तर्क है कि वह उन ‘दोहरे इस्तेमाल की वस्तुओं’ (Dual-use goods) की आपूर्ति पर रोक लगा रहा है जिनका उपयोग जापानी सेना हथियारों के निर्माण में कर सकती है। चीनी राजदूत वू जियांगहाओ ने इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के लिए उठाया गया कदम बताया है। हालांकि, कूटनीतिक जानकार इसे जापान द्वारा ताइवान के प्रति दिखाए जा रहे समर्थन का ‘आर्थिक प्रतिशोध’ मान रहे हैं।
साके और इतिहास का कड़वा स्वाद
जापान की समाचार एजेंसी क्योदो के अनुसार, चीन की सीमा शुल्क प्रक्रियाओं में जापान की पारंपरिक शराब ‘साके’ और अन्य प्रसंस्कृत खाद्य सामग्री की खेपें अटक गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि (Trade restrictions on Japanese exports) के तहत चीन ने ‘साके’ को जापान की सांस्कृतिक पहचान मानकर उसे निशाना बनाया है। इस कूटनीतिक जंग का सीधा असर जापान के उन निर्यातकों पर पड़ रहा है जो चीनी बाजार पर निर्भर हैं। जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरु किहारा ने इस स्थिति पर ‘कड़ी नजर’ रखने और जरूरी कदम उठाने की बात कही है।
ताकाइची का बयान और ताइवान का पेच
इस ताजा विवाद की चिंगारी नवंबर में तब सुलगी थी, जब जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने ताइवान की सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने संकेत दिया था कि यदि चीन ताइवान पर (Military force usage on Taiwan) करता है, तो जापान मूकदर्शक नहीं रहेगा। चीन, जो ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, इस बयान से तिलमिला उठा है। चीन ने पिछले महीने ही ताइवान के करीब बड़े पैमाने पर युद्धाभ्यास कर अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया था, जिसे जापान ने अपनी सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देखा है।
‘सैन्यवाद’ की चेतावनी और इतिहास का दोहराव
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य पत्र ‘पीपुल्स डेली’ ने जापान सरकार के दक्षिणपंथी झुकाव पर तीखा प्रहार किया है। संपादकीय में चेतावनी दी गई है कि (Japanese militarism resurgence) का रास्ता देश को फिर से विनाश की ओर ले जाएगा। चीन ने 1895 के युद्ध और 20वीं सदी के जापानी आक्रमण का हवाला देते हुए कहा कि जापान को अपने आक्रामक इतिहास से सबक लेना चाहिए। चीन की भाषा में इस बार खास बात यह रही कि उसने जापानी जनता और वहां की दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकार के बीच स्पष्ट अंतर दिखाने की कोशिश की है।
दक्षिण कोरिया के साथ चीन की नई ‘दोस्ती’
एक तरफ जहां जापान के साथ रिश्ते रसातल में जा रहे हैं, वहीं चीन ने दक्षिण कोरिया के प्रति (Strategic diplomacy with South Korea) का रुख अपनाया है। राष्ट्रपति ली जे म्युंग की बीजिंग यात्रा के दौरान चीन ने न केवल उनका गर्मजोशी से स्वागत किया, बल्कि करोड़ों डॉलर के नए निर्यात समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए। चीनी मीडिया ने इस यात्रा को ‘नए अध्याय की शुरुआत’ बताया है। यह कदम जापान को अलग-थलग करने की चीन की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
पर्यटन और कूटनीतिक संवेदनाएं
चीनी सरकार ने अपने नागरिकों के लिए जापान यात्रा को ‘खतरनाक’ बताते हुए आगाह किया है, जिसके परिणामस्वरूप नए साल के दौरान चीनी पर्यटकों ने जापान के बजाय दक्षिण कोरिया को प्राथमिकता दी। हालांकि, इस तनाव के बीच कूटनीति का एक मानवीय पक्ष भी दिखा। बीजिंग में (Chinese foreign ministry briefing) के दौरान चीन ने जापान के एक पूर्व राजदूत के निधन पर संवेदना व्यक्त की। यह छोटी सी घटना संकेत देती है कि कूटनीतिक गलियारों में संवाद के दरवाजे अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
भविष्य की धुंधली तस्वीर और एशिया की सुरक्षा
चीन और जापान के बीच बढ़ता यह तनाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहने वाला है। जापान द्वारा अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के प्रयासों और चीन की विस्तारवादी नीतियों के बीच (Security dynamics in East Asia) में भारी बदलाव की संभावना है। यदि दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए कोई समाधान नहीं निकलता है, तो यह तनाव एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ले सकता है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ना निश्चित है।



