स्वास्थ्य

PCOS – आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता हार्मोनल असंतुलन और महिलाओं पर असर

PCOS – पिछले कुछ वर्षों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी पीसीओएस महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे चर्चित और चिंताजनक समस्याओं में शामिल हो गया है। खासतौर पर प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार, यह सिर्फ पीरियड्स की अनियमितता या गर्भधारण से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि शरीर के हार्मोनल तंत्र से जुड़ा एक जटिल विकार है, जो पूरे मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है। शहरी जीवनशैली, तनाव और बदलती खानपान की आदतों ने इस समस्या को और व्यापक बना दिया है।

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हार्मोनल असंतुलन कैसे पैदा होता है

पीसीओएस की शुरुआत अक्सर तब होती है जब शरीर में इंसुलिन का स्तर असामान्य रूप से बढ़ने लगता है। यह बढ़ा हुआ इंसुलिन अंडाशय को जरूरत से ज्यादा एण्ड्रोजन बनाने के लिए प्रेरित करता है, जिसे सामान्य भाषा में पुरुष हार्मोन कहा जाता है। इसका सीधा असर ओव्यूलेशन पर पड़ता है और अंडाशय में छोटी-छोटी सिस्ट बनने लगती हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड, शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक दबाव इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। अगर इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो यह आगे चलकर डायबिटीज और हृदय रोग जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकता है।

पीसीओएस की जड़ में इंसुलिन रेजिस्टेंस

अधिकतर मरीजों में पीसीओएस का मूल कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस पाया जाता है। इस स्थिति में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति सही ढंग से प्रतिक्रिया नहीं देतीं, जिससे रक्त में शुगर और इंसुलिन दोनों का स्तर बढ़ जाता है। यह असंतुलन चेहरे पर अनचाहे बाल, मुंहासे, तेजी से वजन बढ़ना और पीरियड्स की गड़बड़ी जैसे लक्षण पैदा करता है। पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि आहार में चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम करके इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

बदलती दिनचर्या और बढ़ता तनाव

आज की तेज-तर्रार जीवनशैली में देर रात तक जागना, लंबे समय तक बैठकर काम करना और लगातार मानसिक दबाव लेना आम हो गया है। यह सब मिलकर शरीर में कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन को बढ़ाता है, जो हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ देता है। इसका नतीजा अनियमित मासिक धर्म, थकान और वजन बढ़ने के रूप में सामने आता है। शारीरिक गतिविधि की कमी मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देती है, जिससे वजन कम करना मुश्किल हो जाता है और पीसीओएस के लक्षण और तीव्र हो जाते हैं।

पर्यावरण और आनुवंशिक प्रभाव

पर्यावरण में मौजूद प्रदूषक तत्व और प्लास्टिक में पाए जाने वाले कुछ रसायन भी हार्मोनल गड़बड़ी का कारण बनते हैं। इसके अलावा, पारिवारिक इतिहास भी इस बीमारी में अहम भूमिका निभाता है। अगर किसी महिला की मां या बहन को पीसीओएस रहा है, तो उसके प्रभावित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि सही जीवनशैली अपनाकर आनुवंशिक जोखिम के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

समाधान जीवनशैली में बदलाव से संभव

डॉक्टरों का मानना है कि पीसीओएस को केवल दवाइयों से पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए दिनचर्या और खानपान में बदलाव जरूरी है। फाइबर, प्रोटीन और साबुत अनाज से भरपूर आहार, नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद इस समस्या से निपटने में मददगार साबित होते हैं। शोध बताते हैं कि अगर शरीर के वजन में 5 से 10 प्रतिशत की कमी भी हो जाए तो हार्मोनल संतुलन में सुधार देखा जा सकता है।

विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि महिलाओं को अपने शरीर में हो रहे बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। समय पर पहचान और सही जीवनशैली अपनाकर पीसीओएस के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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