Lung Cancer – गैर धूम्रपान करने वालों में बढ़ता खतरा और शुरुआती चेतावनियां
Lung Cancer – हर वर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है, लेकिन यह केवल एक औपचारिक दिन नहीं बल्कि समाज को झकझोरने और सचेत करने का अवसर भी है। इसका मकसद कैंसर को लेकर फैली गलत धारणाओं को तोड़ना, समय रहते पहचान की अहमियत बताना और बेहतर इलाज तक पहुंच सुनिश्चित करना है। लंबे समय तक यह मान्यता रही कि फेफड़ों का कैंसर मुख्य रूप से धूम्रपान करने वालों की बीमारी है, मगर हाल के वर्षों में तस्वीर तेजी से बदल रही है। भारत के बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जिन्होंने कभी तंबाकू को हाथ तक नहीं लगाया। यह बदलाव केवल चिकित्सकीय चिंता का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

डॉक्टरों का कहना है कि फेफड़ों का कैंसर अक्सर शुरुआती चरण में चुपचाप पनपता रहता है। इसके लक्षण इतने सामान्य लगते हैं कि लोग उन्हें मौसम बदलने, एलर्जी या साधारण खांसी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। इसी वजह से कई मरीज देर से अस्पताल पहुंचते हैं, जब बीमारी उन्नत अवस्था में पहुंच चुकी होती है। इसलिए जागरूकता, सतर्कता और नियमित स्वास्थ्य जांच आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।
बदलते परिवेश में नए जोखिम
धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के पीछे कई पर्यावरणीय और जैविक कारण सामने आए हैं। महानगरों में लगातार बिगड़ती हवा की गुणवत्ता सबसे बड़ा कारक मानी जा रही है। सूक्ष्म प्रदूषक कण सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच जाते हैं और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। लंबे समय तक ऐसे वातावरण में रहने से कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है, भले ही व्यक्ति ने कभी सिगरेट न पी हो।
इसके अलावा, पैसिव स्मोकिंग यानी दूसरों के धुएं में रहने को भी कम खतरनाक नहीं माना जा सकता। घर, कार्यस्थल या सार्वजनिक स्थानों पर धुएं के संपर्क में आने वाले लोग अनजाने में ही विषाक्त तत्वों को सांस के जरिए ग्रहण कर लेते हैं। कई क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली रेडॉन गैस भी जोखिम बढ़ाती है, खासकर बंद और खराब हवादार जगहों में।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में लकड़ी, उपले या अन्य जैव ईंधन पर खाना पकाने की परंपरा महिलाओं के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। रसोई में धुएं का लगातार संपर्क और उचित वेंटिलेशन की कमी कैंसरकारक तत्वों को हवा में जमा कर देती है। इस अदृश्य खतरे पर लंबे समय तक ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन अब चिकित्सा अनुसंधान इसे स्पष्ट रूप से जोखिम कारक मानता है।
शुरुआती संकेत जिन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए
फेफड़ों के कैंसर का सबसे आम प्रारंभिक लक्षण लगातार बनी रहने वाली खांसी है। अगर खांसी दो से तीन सप्ताह से अधिक समय तक रहे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब खांसी के साथ खून आना शुरू हो जाए या बलगम का रंग असामान्य दिखाई दे। कई लोग इसे सामान्य संक्रमण समझकर घरेलू इलाज करते रहते हैं, जिससे कीमती समय हाथ से निकल जाता है।
इसके अलावा, बिना ज्यादा शारीरिक मेहनत किए सांस फूलना, सीने में भारीपन महसूस होना या गहरी सांस लेने पर दर्द होना भी चेतावनी संकेत हो सकते हैं। कुछ मरीजों को हंसते, खांसते या लेटते समय सीने में चुभन जैसा दर्द महसूस होता है। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना समझदारी है।
आवाज में बदलाव और बार-बार संक्रमण
अगर किसी व्यक्ति की आवाज अचानक भारी हो जाए और लंबे समय तक ठीक न हो, तो यह गले या फेफड़ों में किसी असामान्यता का संकेत हो सकता है। इसी तरह, बार-बार निमोनिया, ब्रोंकाइटिस या अन्य श्वसन संक्रमण होना भी चिंता की बात है। यह दर्शाता है कि फेफड़ों की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली कमजोर पड़ रही है।
अचानक और बिना कारण वजन कम होना, लगातार थकान महसूस करना, भूख न लगना या शरीर में कमजोरी भी गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर सकती है। कई बार शरीर ऐसे सूक्ष्म संकेत देता है जिन्हें हम रोजमर्रा की भागदौड़ में नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही संकेत जीवन बचाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
समय पर जांच और बचाव के प्रभावी उपाय
फेफड़ों के कैंसर का इलाज शुरुआती चरणों में ज्यादा सफल होता है। इसलिए विशेषज्ञ जोखिम वाले लोगों को समय-समय पर लो-डोज सीटी स्कैन कराने की सलाह देते हैं। खासकर वे लोग जो अत्यधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहते हैं, धुएं के संपर्क में आते हैं या जिनके परिवार में कैंसर का इतिहास रहा है, उन्हें नियमित जांच को प्राथमिकता देनी चाहिए।
रोकथाम के लिए सबसे जरूरी कदम स्वच्छ हवा की दिशा में बढ़ना है। घरों में उचित वेंटिलेशन सुनिश्चित करना, खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल करना और बाहर जाते समय मास्क पहनना अहम है। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर सख्ती और प्रदूषण नियंत्रण के लिए सामूहिक प्रयास भी उतने ही जरूरी हैं।
अंततः, जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है। समय पर लक्षण पहचानना, सही जांच कराना और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना फेफड़ों के कैंसर के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।



