स्वास्थ्य

Kyasanur Forest Disease – उडुपी में 29 वर्षीय युवक की मौत, कर्नाटक में बढ़ी सतर्कता

Kyasanur Forest Disease – कर्नाटक में एक दुर्लभ लेकिन गंभीर जूनोटिक बीमारी से हुई मौत के बाद स्वास्थ्य तंत्र अलर्ट मोड पर आ गया है। उडुपी जिले में 29 वर्षीय युवक की क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (केएफडी) से मृत्यु ने इस संक्रमण को लेकर पुरानी चिंताओं को फिर से जीवित कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी अक्सर तब तक गंभीर रूप ले लेती है, जब तक इसके लक्षण पहचान में नहीं आते या मरीज देर से अस्पताल पहुंचता है। इस घटना ने जंगल से सटे इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए सतर्कता बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया है।

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Kyasanur Forest Disease – उडुपी में वर्षीय युवक की

उडुपी की घटना ने फिर जगाई चिंता
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, संक्रमित युवक को लक्षण दिखते ही अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 24 घंटे के भीतर संक्रमण की पुष्टि भी हो गई थी। स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त गुरुदत्त हेगड़े ने इसे “असामान्य और दुर्भाग्यपूर्ण” मामला बताते हुए कहा कि सामान्य तौर पर शुरुआती सात दिनों के भीतर पहचान और उपचार मिलने पर मृत्यु का जोखिम काफी कम हो जाता है। इसके बावजूद, कुछ दिनों तक स्थिर रहने के बाद जटिलताओं के कारण मरीज की जान नहीं बचाई जा सकी। यह घटना इसलिए भी अहम है क्योंकि वर्ष 2024 में कर्नाटक में मंकी फीवर के 100 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जो बीमारी के लगातार बने रहने का संकेत देते हैं।

क्या है क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज
क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज को आम बोलचाल में मंकी फीवर कहा जाता है, हालांकि यह सीधे बंदरों से मनुष्यों में नहीं फैलती। यह संक्रमण मुख्य रूप से हेमाफ़ाइसालिस स्पिनिगेरा नामक जंगल में पाए जाने वाले टिक (किलनी) के काटने से होता है। ये कीट अक्सर बंदरों के शरीर पर मौजूद होते हैं, इसलिए बीमार या मृत संक्रमित बंदरों के संपर्क में आने से जोखिम बढ़ जाता है। स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में इसके फैलने का प्रमाण नहीं मिला है। इस बीमारी के मामले आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर से दिखने लगते हैं और जनवरी से अप्रैल के बीच चरम पर पहुंचते हैं।

कौन अधिक जोखिम में
विशेषज्ञ बताते हैं कि जंगलों के आसपास रहने वाले लोग, लकड़हारे, पशुपालक और वन क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर अधिक जोखिम में रहते हैं। जिन इलाकों में बंदरों की आबादी ज्यादा है, वहां संक्रमण की संभावना तुलनात्मक रूप से बढ़ जाती है। बारिश के बाद टिक की सक्रियता बढ़ने से भी खतरा अधिक माना जाता है। स्थानीय समुदायों के लिए जागरूकता और सावधानी इसलिए जरूरी है, क्योंकि शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं।

लक्षण कैसे बढ़ते हैं
मंकी फीवर की शुरुआत अचानक तेज बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द और अत्यधिक थकान से हो सकती है। कुछ दिनों बाद मतली, उल्टी, पेट दर्द, दस्त और भ्रम जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर मामलों में नाक या मसूड़ों से खून आना, त्वचा पर चकत्ते और आंतरिक रक्तस्राव का जोखिम भी रहता है। अगर समय पर इलाज न मिले तो यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है, इसलिए शुरुआती लक्षण दिखते ही चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी माना जाता है।

रोकथाम और टीकाकरण
फिलहाल मंकी फीवर का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है, इसलिए मरीजों को सहायक उपचार और लक्षणों के अनुसार दवाएं दी जाती हैं। राहत की बात यह है कि इस संक्रमण से बचाव के लिए वैक्सीन उपलब्ध है। कर्नाटक के अलावा गोवा, महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु के कुछ संवेदनशील इलाकों में टीकाकरण की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य विभाग जंगल में जाने वालों को पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनने, टिक-रिपेलेंट क्रीम या स्प्रे इस्तेमाल करने और बीमार या मृत बंदरों को न छूने की हिदायत देता है। स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान और निगरानी बढ़ाने को भी बीमारी की रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती
विशेषज्ञ मानते हैं कि क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज सिर्फ चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरण और मानव-वन्यजीव संपर्क से जुड़ा मुद्दा भी है। बढ़ते वन-मानव संघर्ष, वनों की कटाई और बदलते पारिस्थितिकी तंत्र के कारण ऐसी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए बेहतर निगरानी, समय पर टीकाकरण और सामुदायिक जागरूकता को दीर्घकालिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।

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