ColorectalCancer – आंतों की सूजन से बढ़ता खतरा, विशेषज्ञों की चेतावनी
ColorectalCancer – “पेट ठीक तो सेहत ठीक” यह कहावत भले पुरानी हो, लेकिन आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। हाल के वर्षों में पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। स्वास्थ्य रिपोर्ट्स बताती हैं कि आंत और पेट से संबंधित कैंसर न केवल तेजी से बढ़ रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलती जीवनशैली और खानपान की आदतें इस बढ़ती चुनौती के पीछे अहम कारण हो सकती हैं।

कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामले
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया में तीसरा सबसे आम कैंसर है और कुल कैंसर मामलों का लगभग दस प्रतिशत हिस्सा इसी से जुड़ा है। यह कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा प्रमुख कारण भी है। आमतौर पर यह बीमारी 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिक देखी जाती थी, लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले सामने आने लगे हैं। बड़ी आंत या मलाशय में शुरू होने वाला यह कैंसर शुरुआती चरण में अक्सर सामान्य पाचन समस्या जैसा प्रतीत होता है, जिससे लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते।
आंतों की सूजन से जुड़ा बड़ा खतरा
हाल में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी स्थिति आगे चलकर कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम कई गुना तक बढ़ा सकती है। कुछ अध्ययनों में यह जोखिम 600 प्रतिशत तक अधिक बताया गया है। इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज, जिसे आईबीडी भी कहा जाता है, पाचन तंत्र में लगातार सूजन की स्थिति है। जिन लोगों को लंबे समय तक यह समस्या रहती है, उनमें आंतों की कोशिकाओं पर दबाव बढ़ता है, जिससे कैंसर की आशंका भी बढ़ सकती है।
किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें
अगर किसी व्यक्ति को बार-बार दस्त या कब्ज की शिकायत रहती है, पेट में लगातार दर्द या ऐंठन होती है, मल त्याग की आदतों में बदलाव आता है या मल में खून दिखाई देता है, तो इसे सामान्य समस्या मानकर टालना ठीक नहीं है। बिना कारण वजन घटना और लगातार थकान भी चेतावनी संकेत हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे लक्षण दिखने पर समय रहते चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है, क्योंकि शुरुआती पहचान से उपचार आसान हो सकता है।
विशेषज्ञों की राय क्या कहती है
ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन की न्यूट्रिशन साइंटिस्ट प्रोफेसर सारा बेरी के अनुसार, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज के मरीजों में पेट दर्द और सूजन की समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है। आईबीडी दरअसल कई स्थितियों का समूह है, जिसमें मुख्य रूप से क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस शामिल हैं। ये दोनों ही आंतों को नुकसान पहुंचाते हैं और यदि लंबे समय तक नियंत्रण में न रहें तो कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। प्रोफेसर बेरी का कहना है कि आईबीडी से पीड़ित लोगों में कम उम्र में भी कोलोरेक्टल कैंसर की संभावना अधिक देखी जा रही है।
भारत में भी बढ़ती चिंता
भारतीय आबादी में भी इस बीमारी के मामलों में इजाफा दर्ज किया जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में इसकी दर अधिक पाई गई है। वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, देश में कोलन कैंसर के 64 हजार से ज्यादा मामले सामने आए। चिंताजनक बात यह है कि 50 वर्ष से कम आयु वर्ग के लोगों में भी इसके 15 से 20 प्रतिशत मामले देखे जा रहे हैं। बदलती जीवनशैली, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और शराब का सेवन जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने जा रहे हैं।
खानपान की भूमिका और बचाव के उपाय
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोसेस्ड फूड और मीठे पेय पदार्थों का अधिक सेवन पाचन तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को आंतों की सूजन और उससे जुड़ी जटिलताओं से जोड़ा गया है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच से जोखिम को कम किया जा सकता है। जिन लोगों को पहले से आईबीडी की समस्या है, उनके लिए नियमित निगरानी और चिकित्सकीय परामर्श विशेष रूप से जरूरी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता ही बचाव की पहली सीढ़ी है। पाचन तंत्र से जुड़े लक्षणों को हल्के में लेने के बजाय समय रहते जांच कराना जीवनरक्षक साबित हो सकता है।



