ChildBrainDevelopment – कोविड लॉकडाउन का बच्चों के मानसिक विकास पर दीर्घकालिक असर
ChildBrainDevelopment – साल 2020 की शुरुआत में जब पहली बार नोवेल कोरोनावायरस के मामलों की खबरें सामने आईं, तब शायद ही किसी ने अनुमान लगाया होगा कि यह संक्रमण पूरी दुनिया की जीवनशैली को गहराई से प्रभावित कर देगा। कोविड-19 महामारी ने स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक जीवन और बच्चों के विकास से जुड़े कई पहलुओं को भी प्रभावित किया। महामारी के दौरान लगाए गए लंबे लॉकडाउन, स्कूलों का बंद होना और पढ़ाई का अचानक ऑनलाइन माध्यम में बदल जाना बच्चों के दैनिक जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आया।

अब महामारी के कई वर्ष बाद विशेषज्ञ यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उस दौर के अनुभवों का बच्चों के मानसिक और मस्तिष्क विकास पर कितना गहरा असर पड़ा। कुछ शोध रिपोर्टों में संकेत मिले हैं कि महामारी के समय की परिस्थितियों ने बच्चों के व्यवहार और सीखने की क्षमता पर ऐसा प्रभाव डाला है, जिसके परिणाम लंबे समय तक दिखाई दे सकते हैं।
बचपन में सामाजिक माहौल की अहम भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि बचपन का शुरुआती समय मस्तिष्क के तेज विकास का दौर होता है। इसी समय बच्चे खेल-कूद, स्कूल और सामाजिक संपर्क के माध्यम से नई चीजें सीखते हैं और अपने व्यवहार को समझना शुरू करते हैं। दोस्तों के साथ समय बिताना, समूह में गतिविधियों में भाग लेना और शिक्षकों के साथ संवाद करना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
महामारी के दौरान जब बच्चे लंबे समय तक घरों के भीतर सीमित रहे, तब इन सामान्य गतिविधियों में अचानक कमी आ गई। कई बच्चों को स्कूल और दोस्तों से दूर रहना पड़ा, जबकि पढ़ाई का बड़ा हिस्सा स्क्रीन के माध्यम से होने लगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव ने बच्चों की सामाजिक समझ और भावनात्मक विकास को प्रभावित किया।
अध्ययन में सामने आई नई चिंताएं
चाइल्ड डेवलपमेंट नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने महामारी के दौरान लगाए गए लॉकडाउन के प्रभावों पर विशेष ध्यान दिया है। अध्ययन के अनुसार, उस समय की परिस्थितियों का असर कई बच्चों के व्यवहार और सीखने की क्षमता पर अभी भी देखा जा रहा है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी के बाद कई देशों में बच्चों के बीच ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, चिंता और तनाव से जुड़ी समस्याओं के मामले पहले की तुलना में अधिक दर्ज किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक घर में सीमित रहना और सामाजिक गतिविधियों की कमी इसके संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं।
छोटे बच्चों पर अधिक असर के संकेत
यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया से जुड़े शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2020 में जब पहला लॉकडाउन लागू हुआ, उस समय जिन बच्चों की उम्र तीन से पांच वर्ष के बीच थी, उन पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक देखा गया।
यह वह उम्र होती है जब बच्चे पहली बार व्यापक सामाजिक माहौल से परिचित होते हैं। इसी दौरान वे दूसरों के साथ संवाद करना, साझा करना और नई परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना सीखते हैं। लेकिन महामारी के कारण स्कूल बंद रहे और बच्चों का अधिकांश समय घर के भीतर ही बीता, जिससे उनके सीखने के सामान्य अनुभव प्रभावित हुए।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन बच्चों ने उस समय अपना शुरुआती सामाजिक अनुभव खो दिया, उनमें व्यवहार से जुड़ी कुछ चुनौतियां आगे चलकर अधिक दिखाई दे सकती हैं।
व्यवहार और सीखने की क्षमता पर प्रभाव
अध्ययन में यह भी पाया गया कि महामारी के दौरान छोटे रहे कई बच्चे अब लगभग 10 से 11 वर्ष की उम्र में पहुंच चुके हैं, और उनमें आत्म-नियंत्रण से जुड़ी क्षमताओं में कमी के संकेत देखे गए हैं। आत्म-नियंत्रण का अर्थ है अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार को परिस्थितियों के अनुसार संतुलित करना।
रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे बच्चों में नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर देखी गई। इसके अलावा उनकी संज्ञानात्मक लचीलेपन से जुड़ी क्षमता भी कम दर्ज की गई। यह मस्तिष्क की वह क्षमता होती है जिसके जरिए व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में सोचने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को बदल सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी के समय के अनुभवों का प्रभाव सभी बच्चों पर समान नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में इसके संकेत लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इसलिए अब शिक्षा और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि बच्चों को बेहतर सामाजिक वातावरण, खेल-कूद और मानसिक सहयोग उपलब्ध कराया जाए, ताकि उनके विकास की प्रक्रिया को फिर से मजबूत किया जा सके।



