BellyFatRisk – सामने आया पेट की बढ़ती चर्बी और मांसपेशियों की कमी का खतरनाक असर
BellyFatRisk – पेट के आसपास जमा होने वाली अतिरिक्त चर्बी को अक्सर लोग सिर्फ बाहरी रूप-रंग से जोड़कर देखते हैं, लेकिन हालिया शोध यह संकेत देते हैं कि इसका असर इससे कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब शरीर में फैट बढ़ता है और साथ ही मांसपेशियों की मात्रा घटने लगती है, तो यह स्थिति कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है। इस संयोजन को चिकित्सा भाषा में सारकोपेनिक ओबेसिटी कहा जाता है, जो धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर कर सकता है।

पेट की चर्बी और कमजोर मांसपेशियों का संयुक्त खतरा
हाल के अध्ययन में सामने आया है कि पेट की चर्बी और मांसपेशियों की कमी का एक साथ होना, अकेले मोटापे या सिर्फ कमजोरी से कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस स्थिति में मृत्यु का जोखिम काफी बढ़ जाता है और कुछ मामलों में यह खतरा 80 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकता है। यह समस्या खासतौर पर उन लोगों में ज्यादा देखने को मिलती है जिनकी जीवनशैली कम सक्रिय होती है और जिनका खानपान संतुलित नहीं होता।
विशेषज्ञ बताते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियां स्वाभाविक रूप से कमजोर होने लगती हैं, लेकिन अगर इसी दौरान शरीर में चर्बी तेजी से बढ़े, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है। इससे न केवल शारीरिक क्षमता घटती है बल्कि हृदय रोग, मधुमेह और मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है।
अंतरराष्ट्रीय शोध में सामने आई गंभीर तस्वीर
ब्राजील की फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ साओ कार्लोस और ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर संयुक्त अध्ययन किया। इस अध्ययन में पाया गया कि सारकोपेनिक ओबेसिटी का प्रभाव शरीर पर कई स्तरों पर पड़ता है और यह धीरे-धीरे जानलेवा भी बन सकता है।
शोध से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति अक्सर पहचान में देर से आती है, क्योंकि इसके स्पष्ट लक्षण शुरुआती चरण में सामने नहीं आते। यही कारण है कि कई लोग इसके जोखिम को समझ नहीं पाते और समय रहते जरूरी कदम नहीं उठा पाते।
बिना महंगे टेस्ट के भी संभव पहचान
आमतौर पर इस स्थिति की जांच के लिए एमआरआई, सीटी स्कैन या अन्य महंगे परीक्षणों की जरूरत पड़ती है, जो हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं होते। हालांकि इस नए अध्ययन में यह भी सामने आया है कि कुछ सरल तरीकों से भी शुरुआती स्तर पर इस जोखिम का आकलन किया जा सकता है।
कमर की माप, शरीर के वजन, लंबाई और उम्र जैसे सामान्य पैरामीटर के आधार पर मांसपेशियों की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। इससे शुरुआती स्क्रीनिंग आसान हो जाती है और समय रहते जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्थिति की पहचान जल्दी हो जाए, तो सही आहार और नियमित व्यायाम के जरिए इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
शरीर के अंदर कैसे बढ़ता है खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, जब शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होता है, तो यह सूजन को बढ़ावा देता है। यह सूजन धीरे-धीरे मेटाबॉलिक बदलावों को जन्म देती है, जिससे मांसपेशियों का टूटना तेज हो जाता है। यही नहीं, फैट कोशिकाएं मांसपेशियों के भीतर प्रवेश कर उनकी जगह लेने लगती हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
इस प्रक्रिया का असर सिर्फ मांसपेशियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली, हार्मोन संतुलन और ऊर्जा स्तर पर भी पड़ता है। यही कारण है कि सारकोपेनिक ओबेसिटी को एक जटिल और गंभीर स्वास्थ्य समस्या माना जाता है।
रोकथाम के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि इस जोखिम से बचाव पूरी तरह संभव है, यदि समय रहते सही कदम उठाए जाएं। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार और पर्याप्त प्रोटीन का सेवन मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकता है। साथ ही, लंबे समय तक बैठे रहने की आदत को कम करना भी जरूरी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ लोगों को अपनी फिटनेस पर अधिक ध्यान देना चाहिए और समय-समय पर शरीर की जांच करवानी चाहिए, ताकि किसी भी संभावित जोखिम को शुरुआती स्तर पर ही पहचाना जा सके।



