Air Pollution – बढ़ता प्रदूषण और अल्जाइमर का खतरा
Air Pollution – बदलती जीवनशैली और बिगड़ती पर्यावरणीय स्थिति का असर अब केवल फेफड़ों या हृदय तक सीमित नहीं रहा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वायु प्रदूषण का दुष्प्रभाव मस्तिष्क पर भी पड़ सकता है। हाल के वर्षों में दिल की बीमारियों, डायबिटीज और कैंसर के मामलों के साथ-साथ याददाश्त से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं। खास तौर पर अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी स्थितियां पहले जहां अधिकतर 60 वर्ष से ऊपर के लोगों में देखी जाती थीं, वहीं अब 50 वर्ष की आयु में भी इनके लक्षण सामने आने लगे हैं।

प्रदूषण और मस्तिष्क स्वास्थ्य के बीच संबंध
शोधकर्ताओं की एक टीम ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने वाले लोगों में अल्जाइमर का खतरा अधिक हो सकता है। अल्जाइमर एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकार है, जो स्मृति, सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार को प्रभावित करता है। समय के साथ यह दैनिक गतिविधियों को भी प्रभावित करने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सूक्ष्म कणों वाले प्रदूषक, विशेषकर पीएम 2.5, शरीर में प्रवेश कर मस्तिष्क कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
अध्ययन में क्या सामने आया
अमेरिका में 65 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 2.78 करोड़ लोगों पर किए गए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि प्रदूषण के उच्च स्तर वाले क्षेत्रों में रहने वालों में अल्जाइमर और डिमेंशिया के मामले ज्यादा देखे गए। शोध के दौरान करीब 30 लाख अल्जाइमर मामलों की पहचान की गई। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि पीएम 2.5 के स्तर में मामूली वृद्धि भी दिमागी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपरटेंशन या स्ट्रोक जैसी पुरानी बीमारियों की तुलना में वायु प्रदूषण का प्रभाव कुछ मामलों में अधिक गंभीर पाया गया। जिन लोगों को पहले से स्ट्रोक की समस्या रही है, उनमें प्रदूषण का असर और भी ज्यादा हो सकता है।
दिल्ली जैसे शहरों में बढ़ती चिंता
भारत में कई बड़े शहरों, खासकर दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में, वायु गुणवत्ता लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई है। लगातार ऊंचा एयर क्वालिटी इंडेक्स लोगों की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का बोझ बढ़ सकता है।
बच्चों पर भी पड़ सकता है असर
शोध में यह भी संकेत मिले हैं कि प्रदूषण का प्रभाव केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। कुछ अध्ययनों में बच्चों में आईक्यू स्तर में कमी, याददाश्त की कमजोरी और एडीएचडी जैसी समस्याओं से भी इसका संबंध देखा गया है। खासतौर पर निम्न आय वर्ग और प्रदूषित इलाकों में रहने वाले समुदाय अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वायु प्रदूषण से बचाव केवल फेफड़ों की सुरक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे मस्तिष्क स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी गंभीरता से लेने की जरूरत है। बेहतर शहरी योजना, स्वच्छ ईंधन और सार्वजनिक जागरूकता जैसे कदम डिमेंशिया जैसी बीमारियों के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकते हैं।



