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Ghooskhor Pandit – टीजर जारी होते ही मनोज बाजपेयी की फिल्म पर विवाद

Ghooskhor Pandit – मनोज बाजपेयी की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में एक बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म के 2026 स्लेट इवेंट में इस फिल्म का टीजर सार्वजनिक किया गया, जिसके बाद प्रशंसा के साथ-साथ तीखी बहस भी शुरू हो गई है। जहां एक वर्ग इसे सशक्त अपराध-ड्रामा मान रहा है, वहीं दूसरे तबके ने फिल्म के शीर्षक और उसके प्रतीकात्मक अर्थ पर आपत्ति जताई है। फिल्म में बाजपेयी एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका में दिखाई देंगे, जो व्यवस्था के भीतर मौजूद नैतिक द्वंद्व को सामने लाने का प्रयास करती नजर आती है। हालांकि, टीजर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई और विवाद ने रफ्तार पकड़ ली।

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टीजर में दिखी कहानी की झलक
टीजर के अनुसार, मनोज बाजपेयी दिल्ली पुलिस के सीनियर इंस्पेक्टर अजय दीक्षित का किरदार निभा रहे हैं, जिन्हें विभाग के भीतर और बाहर ‘पंडित’ के नाम से जाना जाता है। कहानी में दिखाया गया है कि वे लगभग दो दशक पहले पुलिस बल में शामिल हुए थे, लेकिन उनके दागदार रिकॉर्ड और संदिग्ध कार्यशैली के कारण आज भी उसी पद पर अटके हुए हैं। टीजर में सत्ता, भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के टकराव की झलक मिलती है। फिल्म निर्माताओं का संकेत है कि यह सिर्फ एक पुलिस-ड्रामा नहीं, बल्कि व्यवस्था की खामियों पर टिप्पणी भी है। बावजूद इसके, कई दर्शकों का मानना है कि टीजर में दिखाई गई भाषा और संदर्भ संवेदनशील हो सकते हैं।

टाइटल पर बढ़ता विरोध
फिल्म के नाम को लेकर सबसे ज्यादा आपत्ति सामने आई है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने आरोप लगाया है कि शीर्षक में इस्तेमाल किया गया शब्द किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाता प्रतीत होता है। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दे को दिखाने के लिए किसी जाति या उपनाम को जोड़ना उचित नहीं है। कई लोगों ने मांग की है कि निर्माता फिल्म का टाइटल बदलें, अन्यथा वे इसके बहिष्कार का आह्वान करेंगे। कुछ यूजर्स ने यह भी कहा कि अगर उद्देश्य सिर्फ भ्रष्टाचार दिखाना था, तो इसके लिए अधिक तटस्थ शीर्षक चुना जा सकता था।

सोशल मीडिया की तीखी प्रतिक्रियाएं
विवाद बढ़ने के साथ ही प्लेटफॉर्म एक्स और अन्य सोशल मीडिया साइटों पर तीखे कमेंट्स देखने को मिले। एक यूजर ने व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा कि कुछ प्लेटफॉर्म आतंकवाद को धर्म से नहीं जोड़ते, लेकिन भ्रष्टाचार को एक पहचान से जोड़ने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं दिखती। वहीं दूसरे ने सवाल उठाया कि अगर केवल ‘घूसखोर’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता तो समस्या क्या थी। कुछ लोगों ने इसे जातिगत रूढ़ियों को बढ़ावा देने वाला बताया और सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म से स्पष्टीकरण मांगा। हालांकि, कई दर्शकों ने यह भी कहा कि फिल्म देखने से पहले निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

फिल्म की टीम और संभावित प्रभाव
फिल्म का निर्देशन रितेश शाह ने किया है, जिन्हें इससे पहले कई गंभीर विषयों पर आधारित फिल्मों के लिए जाना जाता है। कलाकारों की बात करें तो मनोज बाजपेयी के अलावा नुसरत भरूचा, साकिब सलीम, अक्षय ओबेरॉय, दिव्या दत्ता, श्रद्धा दास और किकू शारदा अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। विविध कलाकारों की मौजूदगी से यह संकेत मिलता है कि कहानी कई परतों वाली होगी। हालांकि, रिलीज की आधिकारिक तारीख अभी घोषित नहीं की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विवाद इसी तरह बढ़ता रहा तो यह फिल्म के प्रचार और दर्शकों की धारणा दोनों को प्रभावित कर सकता है।

संवेदनशीलता बनाम अभिव्यक्ति की आजादी
यह विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि रचनात्मक अभिव्यक्ति की सीमा कहां तक होनी चाहिए। जहां निर्माता इसे सामाजिक यथार्थ दिखाने का माध्यम बता रहे हैं, वहीं आलोचक इसे अनावश्यक रूप से विभाजनकारी मानते हैं। फिलहाल, न तो फिल्म की टीम और न ही ओटीटी प्लेटफॉर्म की ओर से इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान आया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि निर्माता शीर्षक पर पुनर्विचार करते हैं या अपनी मूल दृष्टि पर कायम रहते हैं।

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