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FilmReview – ‘द केरल स्टोरी 2’ रिलीज के बाद चर्चा तेज

FilmReview – काफी समय से विवादों और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझी रही फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड’ आखिरकार सिनेमाघरों तक पहुंच गई है। रिलीज से पहले सेंसर बोर्ड की आपत्तियों और अदालत में चली बहसों ने इसे सुर्खियों में बनाए रखा। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म से ज्यादा चर्चा उसके इर्द-गिर्द हुए विवादों की रही। पर्दा उठते ही साफ हो जाता है कि फिल्म एक खास विषय को केंद्र में रखकर आगे बढ़ती है और उसी पर लगातार जोर देती है।

कहानी का आधार

फिल्म की कथा तीन युवतियों—दिव्या, नेहा और सुरेखा—के इर्द-गिर्द घूमती है। तीनों अलग-अलग शहरों से हैं और अपने-अपने सपनों को पूरा करने की राह पर चल रही हैं। कहानी के अनुसार, उनके जीवन में ऐसे युवक आते हैं जो शुरुआत में प्रेम और भरोसे का माहौल बनाते हैं, लेकिन बाद में उनका मकसद अलग निकलता है। फिल्म में यह दिखाया गया है कि इन रिश्तों के जरिए लड़कियों को कथित साजिश का हिस्सा बनाया जाता है, जहां धर्म परिवर्तन और दबाव की स्थिति पैदा होती है।

दिव्या एक युवा डांसर है, नेहा खेल जगत में आगे बढ़ना चाहती है, जबकि सुरेखा सिविल सेवा की तैयारी कर रही है। फिल्म में इन तीनों की यात्रा धीरे-धीरे एक ही दिशा में जाती दिखती है। घटनाओं के क्रम में भावनात्मक दबाव, धमकी और हिंसा के दृश्य सामने आते हैं। हालांकि कुछ दृश्य असर छोड़ते हैं, लेकिन कई जगह कहानी दोहराव का शिकार होती नजर आती है। पात्रों के फैसले भी कई बार स्वाभाविक नहीं लगते, जिससे कथानक की गहराई प्रभावित होती है।

अभिनय की मजबूती

फिल्म का सबसे प्रभावी पक्ष कलाकारों का अभिनय है। अदिति भाटिया, ऐश्वर्या ओझा और उल्का गुप्ता ने अपने किरदारों की भावनात्मक स्थिति को विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत किया है। उनके चेहरों पर झलकता डर और असमंजस कई दृश्यों को प्रभावशाली बनाता है। सहायक कलाकारों ने भी अपने हिस्से की भूमिका जिम्मेदारी से निभाई है। खासतौर पर अभिभावकों की भूमिका निभाने वाले कलाकारों ने पारिवारिक दृश्यों में संवेदनशीलता दिखाई है, जो दर्शकों को जोड़ने का काम करती है।

निर्देशन और प्रस्तुति

निर्देशक कमाख्या नारायण सिंह ने फिल्म को डॉक्यूमेंटरी शैली की झलक देने की कोशिश की है। कुछ दृश्यों में वास्तविक घटनाओं से प्रेरणा लेने का संकेत मिलता है। संपादन तेज है और संवाद सीधे संदेश देने की कोशिश करते हैं। हालांकि कई स्थानों पर फिल्म एकतरफा दृष्टिकोण अपनाती दिखाई देती है। संवेदनशील विषय होने के बावजूद संतुलन की कमी महसूस होती है, जिससे कुछ दर्शकों को असहजता हो सकती है।

विवाद और आलोचना

फिल्म को लेकर सबसे अधिक सवाल इसके प्रस्तुतीकरण पर उठ रहे हैं। कुछ समीक्षकों का मानना है कि कथा में एक विशेष समुदाय को नकारात्मक रोशनी में दिखाया गया है। दृश्य संयोजन और प्रकाश के इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा है, जहां अलग-अलग पृष्ठभूमि को अलग तरीके से चित्रित किया गया है। इस कारण फिल्म के संतुलन पर बहस जारी है। साथ ही, कुछ पात्रों का सीमित विकास कहानी को अपेक्षित मजबूती नहीं दे पाता।

देखें या न देखें

यह फिल्म उन दर्शकों को आकर्षित कर सकती है जो सामाजिक और विवादित विषयों पर बनी फिल्मों में रुचि रखते हैं। हालांकि यदि कोई संतुलित और बहुआयामी कहानी की उम्मीद लेकर जाता है, तो उसे कुछ कमी महसूस हो सकती है। कुल मिलाकर, ‘द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड’ एक ऐसा सिनेमाई प्रयास है जो चर्चा जरूर पैदा करता है, लेकिन हर दर्शक के लिए समान अनुभव नहीं दे पाता।

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