AccusedReview – गंभीर मनोवैज्ञानिक ड्रामा में मजबूत अभिनय का उदाहरण है यह फिल्म
AccusedReview – अनुभूति कश्यप की फिल्म ‘अक्यूज्ड’ एक ऐसे विषय को सामने लाती है, जो आज के समय में बेहद संवेदनशील और जटिल माना जाता है। कहानी किसी सनसनीखेज अंदाज में नहीं, बल्कि ठहराव और गंभीरता के साथ आगे बढ़ती है। शुरुआत से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म का मकसद आरोप सही या गलत साबित करना नहीं, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक दबाव को समझना है जो किसी भी व्यक्ति पर अचानक लगे आरोप के बाद पैदा होता है। माहौल संयमित है, संवाद सीमित हैं और भावनाएं भीतर ही भीतर उफनती नजर आती हैं।

कहानी का आधार और पृष्ठभूमि
फिल्म की कहानी लंदन में रह रही डॉ. गीतिका के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पेशे में सम्मानित और सफल हैं। सब कुछ सामान्य चल रहा होता है, तभी उन पर यौन दुराचार का आरोप लग जाता है। यह आरोप उनके पेशेवर जीवन के साथ-साथ निजी संबंधों पर भी गहरा असर डालता है। अस्पताल का माहौल बदल जाता है, सहकर्मियों का व्यवहार ठंडा पड़ने लगता है और कानाफूसियां तेज हो जाती हैं। सोशल मीडिया पर फैलती अधूरी जानकारियां स्थिति को और उलझा देती हैं। फिल्म इन परिस्थितियों को बिना अतिनाटकीयता के, वास्तविक अंदाज में प्रस्तुत करती है।
रिश्तों की दरार और भावनात्मक संघर्ष
गीतिका की साथी मीरा शुरुआत में मजबूती से उनके साथ खड़ी दिखाई देती है। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है और दबाव बढ़ता है, मीरा के भीतर भी असमंजस और डर घर करने लगता है। यही बदलाव कहानी को गहराई देता है। फिल्म यह दिखाने में सफल रहती है कि किसी एक आरोप का असर सिर्फ आरोपी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके आसपास के लोगों के विश्वास और भावनाओं को भी प्रभावित करता है। रिश्तों में पैदा हुई दूरी और अनकहे सवाल कहानी का अहम हिस्सा बन जाते हैं।
कोंकणा सेन शर्मा का प्रभावशाली अभिनय
डॉ. गीतिका के किरदार में कोंकणा सेन शर्मा फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती हैं। उनके चेहरे के भाव, आंखों की बेचैनी और लंबे मौन वाले दृश्य काफी असर छोड़ते हैं। वह इस भूमिका को किसी नाटकीय अंदाज में नहीं निभातीं, बल्कि बेहद स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत करती हैं। डर, असुरक्षा, गुस्सा और टूटन—हर भाव उनके अभिनय में सहज रूप से दिखाई देता है। कई दृश्यों में बिना संवाद के भी वह स्थिति की गंभीरता दर्शा देती हैं।
प्रतिभा रांटा और सह कलाकारों का संतुलन
मीरा की भूमिका में प्रतिभा रांटा संतुलित प्रदर्शन करती हैं। उनका किरदार न पूरी तरह मजबूत है, न पूरी तरह कमजोर, बल्कि परिस्थितियों के बीच झूलता हुआ नजर आता है। यही द्वंद्व उनके अभिनय को विश्वसनीय बनाता है। सुकांत गोयल जांच अधिकारी के रूप में सीमित समय में प्रभाव छोड़ते हैं। उनका शांत और संयमित रवैया कहानी को ठोस आधार देता है। सह कलाकारों की मौजूदगी कहानी को वास्तविकता से जोड़ती है, भले ही उनका स्क्रीन टाइम कम हो।
निर्देशन और प्रस्तुति की शैली
अनुभूति कश्यप ने इस फिल्म में एक गंभीर और सधे हुए अंदाज को चुना है। कैमरा वर्क सीधा है, बैकग्राउंड म्यूजिक सीमित रखा गया है और कई दृश्य लंबे शॉट्स में फिल्माए गए हैं। यह शैली दर्शकों को पात्रों की मानसिक स्थिति के करीब ले जाती है। फिल्म किसी निष्कर्ष पर जल्दबाजी में नहीं पहुंचती, बल्कि दर्शकों को सोचने का अवसर देती है। हालांकि इसकी धीमी रफ्तार कुछ दर्शकों को चुनौतीपूर्ण लग सकती है।
कमजोरियां और फीका क्लाइमेक्स
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका अंतिम हिस्सा माना जा सकता है। कहानी जिस गंभीरता और जटिलता के साथ शुरू होती है, उसी स्तर का असर अंत तक कायम नहीं रह पाता। जांच की प्रक्रिया को और विस्तार दिया जा सकता था। कुछ दृश्य एक जैसे भावों पर टिके रहते हैं, जिससे गति धीमी महसूस होती है। क्लाइमेक्स में असली दोषी का खुलासा उतना प्रभावशाली नहीं लगता, जितनी उम्मीद कहानी के शुरुआती हिस्से से बनती है।
देखें या नहीं
‘अक्यूज्ड’ उन दर्शकों के लिए है जो चरित्र आधारित और भावनात्मक रूप से गहरी कहानियां पसंद करते हैं। इसमें तेज मोड़ या चौंकाने वाले ट्विस्ट कम हैं, लेकिन अभिनय और माहौल पर खास ध्यान दिया गया है। अगर आप शांत और गंभीर ड्रामा देखने के इच्छुक हैं, तो यह फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर सकती है। हालांकि जो दर्शक तेज रफ्तार और मजबूत क्लाइमेक्स की उम्मीद रखते हैं, उन्हें यह फिल्म थोड़ी अधूरी लग सकती है।



