Fail Cars of India History: सड़कों पर धूल फांकते ‘आइकॉन’, आखिर क्यों बुरी तरह पिट गईं ये 7 तगड़ी कारें…
Fail Cars of India History: टाटा नैनो केवल एक कार नहीं, बल्कि हर भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार को चार पहियों की सवारी देने का एक जज्बाती वादा था। रतन टाटा ने इसे महज 1 लाख रुपये की शुरुआती कीमत पर पेश कर (Automobile Marketing Strategy) वैश्विक स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। लेकिन, यही ‘सबसे सस्ती कार’ का टैग इसके लिए काल बन गया। भारतीयों ने इसे स्टेटस सिंबल के बजाय ‘गरीबों की कार’ के रूप में देखा। सिंगूर भूमि विवाद और इंजन में आग लगने की छिटपुट घटनाओं ने रही-सही कसर पूरी कर दी, जिससे नैनो का सफर समय से पहले ही थम गया।

स्टेशन वैगन का वो प्रयोग जो किसी को न भाया
मारुति सुजुकी ने बलेनो अल्टूरा के जरिए भारतीय बाजार में एक नई बॉडी स्टाइल ‘स्टेशन वैगन’ लाने का साहसिक प्रयास किया था। बलेनो सेडान पर आधारित इस कार में (Boot Space Utility) जबरदस्त जगह और लंबी बॉडी दी गई थी। हालांकि, भारतीय ग्राहकों की मानसिकता हमेशा से कार को लंबा देखने के बजाय ऊंचा यानी एसयूवी स्टाइल में देखने की रही है। सेडान के मुकाबले इस अजीबोगरीब दिखने वाले मॉडल को लोगों ने सिरे से नकार दिया और यह कार बिना किसी शोर-शराबे के शोरूम्स से गायब हो गई।
प्रीमियम लुक और भारी कीमत का बेमेल तालमेल
शेवरले ने जब अपनी एसआर-वी (SR-V) को भारत में उतारा, तो इसके मस्कुलर और शार्प लुक्स ने युवाओं का ध्यान जरूर खींचा। यह एक ऐसी प्रीमियम हैचबैक थी (Premium Hatchback Segment) जिसका डिजाइन आज के दौर में भी काफी आधुनिक और स्टाइलिश लगता है। लेकिन, उस समय के हिसाब से इसकी अत्यधिक कीमत और औसत से कम माइलेज ने ग्राहकों के कदम पीछे खींच लिए। ब्रांड पर सीमित भरोसा और हाई मेंटेनेंस कॉस्ट ने इस बेहतरीन दिखने वाली कार को इतिहास के पन्नों में समेट दिया।
गोवा की गलियों से निकली पहली देसी कन्वर्टिबल
सैन स्टॉर्म (San Storm) भारत की इकलौती ऐसी कार थी जिसने बेहद कम कीमत पर ‘कन्वर्टिबल’ यानी खुली छत वाली कार का रोमांच देने का वादा किया था। गोवा की सैन मोटर्स द्वारा निर्मित यह दो दरवाजों वाली कार (Convertible Car Culture) दिखने में बेहद कूल और स्पोर्टी थी। मगर, जैसे ही यह सड़कों पर उतरी, इसकी कमजोर बिल्ड क्वालिटी और सुरक्षा फीचर्स की कमी उजागर होने लगी। कम ब्रांड वैल्यू और सर्विस नेटवर्क के अभाव में यह ‘स्टाइलिश सपना’ जल्द ही एक बुरे अनुभव में बदल गया।
रईसों का शौक और आम आदमी की पहुंच से दूर
फॉक्सवैगन बीटल दुनिया भर में एक ‘लीजेंडरी कार’ मानी जाती है, लेकिन भारत में इसका लॉन्च किसी लाइफस्टाइल खिलौने जैसा रहा। जब यह कार भारतीय सड़कों पर उतरी (Lifestyle Vehicle Pricing) तो इसकी कीमत इतनी ज्यादा थी कि यह केवल अमीरों के गैराज की शोभा बनकर रह गई। दो दरवाजों का लेआउट और भारतीय परिवारों की जरूरतों के हिसाब से इसकी कम व्यवहारिकता ने इसे कभी मास मार्केट का हिस्सा नहीं बनने दिया। अंततः, अपनी क्यूट मुस्कान के बावजूद बीटल केवल कुछ मेट्रो शहरों की याद बनकर रह गई।
अंतरिक्ष यान जैसा लुक और बटरफ्लाई डोर्स का जादू
टोयोटा सेरा अपने समय से बहुत आगे की कार थी, जिसके ‘बटरफ्लाई डोर्स’ ऊपर की तरफ खुलते थे। इसमें चारों तरफ कांच का इस्तेमाल किया गया था, जो इसे (Futuristic Car Design) किसी वंडर कार या स्पेसशिप जैसा लुक देता था। तकनीकी रूप से यह कार बेजोड़ थी, लेकिन भारत में इसे सीमित संख्या में इम्पोर्ट किया गया था। ऊंची लागत और स्पेयर पार्ट्स की अनुपलब्धता ने इसे आम ग्राहकों से दूर रखा। आज यह कार केवल कुछ कार कलेक्टर्स के पास ही एक विंटेज संपत्ति के रूप में बची है।
रफ्तार की दीवानगी जो ऊंचे दामों में उलझ गई
निसान 370Z एक शुद्ध स्पोर्ट्स कार थी, जिसमें ताकतवर V6 इंजन और सड़क पर चीते जैसी फुर्ती मिलती थी। ग्लोबल मार्केट में यह कार (Sports Car Performance) एक बड़ी हिट थी, लेकिन भारत में इसकी कहानी कुछ अलग रही। यहाँ स्पोर्ट्स कार कल्चर की कमी और निसान के कमजोर सर्विस नेटवर्क ने इसकी राह मुश्किल कर दी। करोड़ों की कीमत और भारतीय सड़कों की खराब स्थिति ने इस स्पोर्ट्स कार के सपने को कभी हकीकत में तब्दील नहीं होने दिया और यह बाजार से बाहर हो गई।



