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बिज़नेस

AutoMarket – भारतीय कंपनियों की बढ़त, विदेशी ब्रांड्स की हिस्सेदारी में आई गिरावट

AutoMarket – भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। घरेलू कंपनियों ने अपनी रणनीति और उत्पादों के दम पर बाजार में मजबूत पकड़ बनाई है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी वित्तीय वर्ष 2022 के करीब 18 प्रतिशत से बढ़कर 2026 तक 27 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि ग्राहकों की पसंद और बाजार की दिशा तेजी से बदल रही है।

भारतीय कंपनियों की मजबूत होती पकड़

महिंद्रा और टाटा मोटर्स इस बदलाव के सबसे बड़े उदाहरण बनकर सामने आए हैं। महिंद्रा ने एसयूवी सेगमेंट में आक्रामक रणनीति अपनाते हुए स्कॉर्पियो-एन, थार और एक्सयूवी सीरीज जैसे मॉडलों के जरिए ग्राहकों का भरोसा जीता है। इसका असर यह हुआ कि कंपनी की बाजार हिस्सेदारी लगभग दोगुनी होकर 13 प्रतिशत से अधिक हो गई। दूसरी ओर, टाटा मोटर्स ने इलेक्ट्रिक वाहनों और कॉम्पैक्ट एसयूवी सेगमेंट में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। नेक्सन और पंच जैसे मॉडल्स ने कंपनी को शहरी और छोटे शहरों दोनों में लोकप्रिय बनाया है।

मारुति शीर्ष पर, लेकिन दबाव बढ़ा

मारुति सुजुकी अभी भी बाजार में सबसे आगे है और उसकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। हालांकि, पहले के मुकाबले इसमें गिरावट दर्ज की गई है। बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ग्राहकों की बदलती पसंद ने कंपनी के लिए नई चुनौतियां खड़ी की हैं। इसके बावजूद मजबूत नेटवर्क और भरोसे के कारण मारुति अपनी स्थिति बनाए हुए है।

ह्यूंदै और अन्य विदेशी कंपनियों को झटका

विदेशी कंपनियों, खासकर कोरियाई और यूरोपीय ब्रांड्स के लिए यह दौर चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। ह्यूंदै, जो लंबे समय तक दूसरे स्थान पर रही, अब चौथे स्थान पर खिसक गई है। उसकी हिस्सेदारी में भी गिरावट देखी गई है। इसी तरह यूरोपीय कंपनियों की हिस्सेदारी भी लगातार कम हो रही है, जो बाजार में उनकी कमजोर होती पकड़ को दर्शाती है।

नई कंपनियों की एंट्री से बढ़ी प्रतिस्पर्धा

चीनी मूल से जुड़े ब्रांड्स जैसे एमजी मोटर और बीवाईडी ने भी धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है। हालांकि उनकी हिस्सेदारी अभी सीमित है, लेकिन शून्य से बढ़कर 1.5 प्रतिशत तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। नई तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर देकर ये कंपनियां बाजार में जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं।

ग्राहकों की पसंद में बदलाव बना बड़ा कारण

ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारतीय कंपनियों की सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण ग्राहकों की जरूरतों को बेहतर तरीके से समझना है। एसयूवी की बढ़ती मांग, बेहतर फीचर्स और किफायती कीमतों ने घरेलू ब्रांड्स को बढ़त दिलाई है। कंपनियों ने तेजी से नए मॉडल लॉन्च किए और तकनीक को अपनाने में भी सक्रियता दिखाई।

विदेशी कंपनियों की रणनीति पर उठे सवाल

विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी कंपनियां बाजार की बदलती मांग के साथ तालमेल नहीं बैठा सकीं। नए मॉडल लॉन्च करने में देरी और सीमित विकल्पों ने उन्हें पीछे कर दिया। इसके अलावा डीलर नेटवर्क और ग्राहकों तक पहुंच की कमी भी एक अहम वजह रही है। तेजी से बदलते भारतीय बाजार में समय पर प्रतिक्रिया न दे पाना उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ।

भविष्य में प्रतिस्पर्धा और तेज होने के संकेत

मौजूदा रुझानों को देखते हुए साफ है कि आने वाले समय में भारतीय कंपनियां अपनी पकड़ और मजबूत करने की कोशिश करेंगी, जबकि विदेशी ब्रांड्स के सामने खुद को दोबारा स्थापित करने की चुनौती रहेगी। तकनीक, कीमत और ग्राहक अनुभव के आधार पर प्रतिस्पर्धा और तीखी होने की संभावना है।

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