AutoExport – यूरोपीय संघ में भारत की गाड़ियों की बढ़ी मांग
AutoExport – वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल से दिसंबर तक के नौ महीनों में भारत का ऑटोमोटिव निर्यात यूरोपीय संघ के देशों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। इस अवधि में निर्यात का मूल्य करीब 2.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष इसी अवधि के 1.6 बिलियन डॉलर से काफी अधिक है। भारतीय मुद्रा में यह आंकड़ा लगभग 18 हजार करोड़ रुपये से ऊपर बैठता है। अब भारत के कुल वैश्विक ऑटो निर्यात में यूरोप की हिस्सेदारी बढ़कर 11.6 प्रतिशत हो गई है।

यूरोप जैसे कड़े बाजार में मजबूत पकड़
यूरोपीय संघ को लंबे समय से ऑटो उद्योग के लिए चुनौतीपूर्ण बाजार माना जाता है। यहां सुरक्षा और उत्सर्जन मानकों को लेकर सख्त नियम लागू हैं। ऐसे में भारतीय कंपनियों का इस बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत करना उद्योग के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
पिछले वर्ष की तुलना में निर्यात में आई तेजी इस बात का संकेत है कि भारतीय वाहन निर्माता यूरोपीय मानकों के अनुरूप उत्पाद तैयार करने में सक्षम हो रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय गाड़ियां और ऑटो कंपोनेंट्स अब वहां अधिक स्वीकार्यता पा रहे हैं।
वैश्विक निर्यात में भी बढ़त
केवल यूरोप ही नहीं, भारत का कुल वैश्विक ऑटोमोटिव निर्यात भी बढ़ा है। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में यह आंकड़ा 19.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 16.8 बिलियन डॉलर था।
इस बढ़ोतरी से स्पष्ट है कि भारत वैश्विक ऑटो सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। यूरोप की बढ़ती हिस्सेदारी यह भी दर्शाती है कि भारतीय कंपनियां प्रीमियम बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार हैं।
ईवी और एडवांस तकनीक की बढ़ती भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, हाइब्रिड मॉडल और एडवांस ऑटो कंपोनेंट्स की मांग ने निर्यात को गति दी है। यूरोपीय बाजार में कम उत्सर्जन वाले वाहनों की मांग लगातार बढ़ रही है। भारतीय निर्माता इस बदलाव के अनुरूप अपने पोर्टफोलियो को ढाल रहे हैं।
स्मार्ट ऑटो टेक्नोलॉजी और डिजिटल फीचर्स से लैस वाहनों के निर्यात में भी संभावनाएं देखी जा रही हैं। इससे भारत की भूमिका केवल एक मैन्युफैक्चरिंग बेस तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स के सप्लायर के रूप में भी मजबूत होगी।
कृषि निर्यात में भी सकारात्मक संकेत
यूरोपीय संघ के साथ व्यापार केवल ऑटो सेक्टर तक सीमित नहीं है। कृषि उत्पादों के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। अनाज का निर्यात लगभग दोगुना होकर 339 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
इसके अलावा मछली, कॉफी, चाय, मसाले और रेजिन जैसे उत्पादों की मांग में भी सुधार देखा गया है। इससे संकेत मिलता है कि भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक संबंध बहुआयामी रूप ले रहे हैं।
मुक्त व्यापार समझौते से नई उम्मीद
अधिकारियों का कहना है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल ही में संपन्न मुक्त व्यापार समझौते से आने वाले समय में निर्यात को और बढ़ावा मिल सकता है। यदि भारतीय उत्पादों को शून्य या कम शुल्क पर बाजार तक पहुंच मिलती है, तो प्रतिस्पर्धा की स्थिति और मजबूत होगी।
टैरिफ में कमी से भारतीय गाड़ियां और कृषि उत्पाद यूरोपीय बाजार में अन्य देशों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। इससे खासतौर पर एमएसएमई निर्यातकों को नए अवसर मिलेंगे और सप्लाई चेन का एकीकरण मजबूत होगा।
आगे की दिशा
आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत का निर्यात ढांचा धीरे-धीरे उच्च मानकों वाले बाजारों की ओर बढ़ रहा है। यूरोपीय संघ में बढ़ती हिस्सेदारी न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय उद्योग की गुणवत्ता और विश्वसनीयता का भी संकेत है।
यदि वर्तमान रफ्तार बनी रहती है और व्यापारिक समझौतों का लाभ समय पर मिलता है, तो आने वाले वर्षों में भारत का ऑटो और कृषि निर्यात यूरोप में नई ऊंचाइयों को छू सकता है।



