CustodyCase – दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों की भलाई को दिया विदेशी आदेश से ऊपर महत्व
CustodyCase – दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अंतरराष्ट्रीय पारिवारिक विवाद से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि नाबालिग बच्चों की भलाई किसी भी विदेशी अदालत के आदेश से अधिक महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक भारतीय मां और पाकिस्तान मूल के ब्रिटिश नागरिक पिता के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर विवाद चल रहा है। दोनों बच्चे ब्रिटिश नागरिक हैं और पिछले दो वर्षों से अपनी मां के साथ दिल्ली में रह रहे हैं।

विदेशी अदालत के आदेश पर अदालत की टिप्पणी
इस मामले में ब्रिटेन की एक हाईकोर्ट ने बच्चों को पिता के पास वापस भेजने का आदेश दिया था। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी देश की अदालत का आदेश बच्चों के हितों से ऊपर नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविन्द्र डुडेजा की खंडपीठ ने इस मामले में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखना सर्वोपरि है।
बच्चों की मौजूदा स्थिति को माना महत्वपूर्ण
अदालत के सामने प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार दोनों बच्चे, जिनकी उम्र 12 और 8 वर्ष है, पिछले वर्ष से दिल्ली में अपनी मां के साथ रह रहे हैं। अदालत ने पाया कि वे सुरक्षित वातावरण में हैं और एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि यह विवाद दो अलग-अलग देशों से जुड़े माता-पिता के बीच पारिवारिक मतभेद का मामला है। ऐसे में अदालत का प्रमुख ध्यान बच्चों के हित और उनके भविष्य पर होना चाहिए।
संयुक्त परिवार के साथ रहने को बताया सकारात्मक
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि बच्चे दिल्ली में अपने नाना और मौसी के साथ संयुक्त परिवार में रह रहे हैं। उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों के आधार पर अदालत ने माना कि बच्चों को परिवार के इस माहौल में सुरक्षा और भावनात्मक सहारा मिल रहा है।
अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों को उस पारिवारिक वातावरण से अचानक अलग करना उनके हित में नहीं माना जा सकता।
भारत आने की परिस्थितियों का भी उल्लेख
मामले से जुड़े विवरण के अनुसार महिला अगस्त 2023 में अपने पति की सहमति से बच्चों के साथ भारत आई थीं। वह दिल्ली स्थित अपने मायके में एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आई थीं।
इसके बाद नवंबर 2023 में महिला ने कड़कड़डूमा स्थित पारिवारिक अदालत में बच्चों की कस्टडी को लेकर याचिका दाखिल की। इस दौरान बच्चों के वीजा की अवधि भी बढ़ाई गई।
पिता की याचिका पर अदालत का फैसला
पाकिस्तान मूल के ब्रिटिश नागरिक पिता ने अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर बच्चों को वापस दिलाने की मांग की थी। उनका कहना था कि उनकी पत्नी बच्चों को उनसे बातचीत करने की अनुमति नहीं देती।
हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों और बच्चों की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि फिलहाल बच्चों का दिल्ली में रहना उनके हित में प्रतीत होता है।
विवाह और पारिवारिक पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता के अनुसार उनकी मुलाकात भारत की रहने वाली महिला से ब्रिटेन में हुई थी। वर्ष 2011 में दोनों ने सऊदी अरब में मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार विवाह किया था। बाद में इस विवाह का पंजीकरण यूनाइटेड किंगडम में कराया गया।
दंपति के दो बेटे हैं, जिनमें बड़े बेटे का जन्म 2014 में और छोटे का जन्म 2018 में हुआ। वर्तमान में दोनों बच्चों की कस्टडी को लेकर कानूनी विवाद जारी है, जिस पर विभिन्न अदालतों में सुनवाई होती रही है।



