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InternationalPolitics – रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी मोहलत को लेकर विपक्ष का सरकार पर हमला

InternationalPolitics – अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीद से जुड़े मामले में भारत को 30 दिन की अस्थायी राहत दिए जाने की खबर सामने आने के बाद देश की राजनीति में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों के कई नेताओं ने इसे भारत की विदेश नीति और निर्णय लेने की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। खास तौर पर शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने इस विषय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और कहा है कि किसी भी अन्य देश को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह भारत को यह बताए कि उसे किस देश से तेल खरीदना चाहिए या नहीं।

विदेश नीति की स्वतंत्रता पर सवाल

मीडिया से बातचीत के दौरान संजय राउत ने कहा कि यह समझ से परे है कि कोई विदेशी शक्ति भारत जैसे बड़े देश को इस तरह की अनुमति दे। उनके अनुसार इस तरह की स्थिति आम तौर पर तब देखी जाती है जब कोई शक्तिशाली देश किसी कमजोर या निर्भर राष्ट्र को निर्देश देता है। राउत ने कहा कि यदि रूस से तेल खरीदने के लिए भारत को एक निश्चित अवधि की छूट दी जा रही है, तो इससे यह संदेश जाता है कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है।

उन्होंने कहा कि ऊर्जा से जुड़ी जरूरतों के मामले में फैसला भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर करना चाहिए। उनके मुताबिक, यदि रूस से तेल खरीदना देश के लिए आर्थिक रूप से लाभदायक है, तो इस पर अंतिम निर्णय भारत सरकार का होना चाहिए, न कि किसी बाहरी देश की मंजूरी पर निर्भर होना चाहिए।

राजनीतिक स्वायत्तता को लेकर चिंता

संजय राउत ने इस पूरे घटनाक्रम को भारत की राजनीतिक स्वायत्तता से जोड़ते हुए भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अगर भारत को अपने व्यापारिक फैसलों के लिए किसी अन्य देश की अनुमति की जरूरत पड़ती है, तो यह एक गंभीर संकेत माना जा सकता है। राउत ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्ट और मजबूत रुख अपनाने की अपील की।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत लंबे समय से स्वतंत्र विदेश नीति की बात करता आया है और वैश्विक मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय निर्णय को लेकर यह धारणा बनना कि भारत पर बाहरी दबाव है, चिंता का विषय हो सकता है।

कांग्रेस ने भी जताई आपत्ति

इस मामले में कांग्रेस नेता और सांसद जयराम रमेश ने भी सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि हाल ही में हुए व्यापार समझौतों के संदर्भ में भारत और अमेरिका के बीच आयात शुल्क को लेकर भी कई बदलाव सामने आए हैं। रमेश के मुताबिक, भारत कुछ क्षेत्रों में आयात शुल्क कम करने की बात कर रहा है, जबकि अमेरिका अपने आयात शुल्क बढ़ा रहा है।

जयराम रमेश ने अमेरिकी अधिकारियों के उस बयान पर भी आपत्ति जताई जिसमें रूस से तेल खरीद को लेकर टिप्पणी की गई थी। उनका कहना था कि किसी भी दूसरे देश को भारत की संप्रभुता से जुड़े फैसलों पर प्रमाणपत्र देने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि अतीत में भी ऐसे हालात बने थे, लेकिन तब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्पष्ट जवाब दिया था।

कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि इस मुद्दे के साथ-साथ व्यापार समझौते से जुड़े पहलुओं को भी संसद में उठाया जाएगा ताकि सरकार से इस पर जवाब मांगा जा सके।

आरजेडी नेता की भी तीखी प्रतिक्रिया

इसी मुद्दे पर राष्ट्रीय जनता दल के नेता मनोज कुमार झा ने भी केंद्र सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका के ट्रेजरी विभाग द्वारा भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी अनुमति देने की बात सामने आई है, जो कई सवाल खड़े करती है।

समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में मनोज झा ने कहा कि इस तरह की भाषा और परिस्थितियां देश के लिए सम्मानजनक नहीं मानी जा सकतीं। उन्होंने सवाल किया कि इस विषय पर विदेश मंत्री, पेट्रोलियम मंत्री और प्रधानमंत्री की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई।

मनोज झा के मुताबिक, ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को देश के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए क्या रणनीति अपना रहा है।

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