स्वास्थ्य

Loneliness – अकेलापन बढ़ा सकता है कैंसर का खतरा, अध्ययन में हुए चौंकाने वाले संकेत

Loneliness – कैंसर को दुनिया की सबसे गंभीर बीमारियों में गिना जाता है और हर साल लाखों लोगों की जान इसी वजह से चली जाती है। आमतौर पर इस बीमारी के पीछे खराब जीवनशैली, असंतुलित खान-पान, प्रदूषण, तंबाकू और शराब जैसी आदतों को जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन हाल में सामने आए एक शोध ने एक ऐसे कारण की ओर भी ध्यान खींचा है, जिस पर अब तक बहुत कम चर्चा हुई थी—अकेलापन। वैज्ञानिकों का कहना है कि सामाजिक रूप से अलग-थलग रहने वाले लोगों में समय के साथ कैंसर विकसित होने का खतरा अधिक हो सकता है। यह संकेत विशेष रूप से उन लोगों के लिए चिंता का विषय है जो लंबे समय तक सामाजिक संपर्क से दूर रहते हैं।

स्वास्थ्य पर अकेलेपन का व्यापक असर

अकेलेपन को लेकर दुनिया भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ पहले भी कई बार चेतावनी दे चुके हैं। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे धीरे-धीरे उभरती वैश्विक समस्या मानती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर छठा व्यक्ति किसी न किसी रूप में अकेलेपन का अनुभव करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डालती है।

अमेरिका के कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने तो यहां तक कहा है कि लगातार अकेलेपन का असर शरीर पर उतना ही नुकसानदायक हो सकता है जितना रोजाना कई सिगरेट पीने का। शोधों में पाया गया है कि ऐसे लोगों में डिमेंशिया का खतरा करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। वहीं कोरोनरी आर्टरी डिजीज या स्ट्रोक का जोखिम भी लगभग 30 प्रतिशत तक ज्यादा हो जाता है। मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव अलग से देखे जाते हैं, जिनमें तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं प्रमुख हैं।

नए शोध में कैंसर से जुड़ाव के संकेत

हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अकेलेपन और कैंसर के संभावित संबंध की पड़ताल की है। यह रिपोर्ट जर्नल कम्युनिकेशन मीडिया में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं ने बड़ी संख्या में लोगों के स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया और पाया कि सामाजिक रूप से अलग-थलग रहने वाले लोगों में कई प्रकार के कैंसर होने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक देखी गई।

अध्ययन के दौरान यह भी सामने आया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यह जोखिम थोड़ा ज्यादा हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकतर लोग अभी तक इस संबंध से अनजान हैं। अनुमान है कि 95 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को यह जानकारी नहीं है कि लंबे समय तक अकेले रहना भी गंभीर बीमारियों के खतरे को बढ़ा सकता है।

अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों का विश्लेषण

इस शोध में 38 से 73 वर्ष की आयु के 3,54,537 लोगों के डेटा का उपयोग किया गया। अध्ययन की शुरुआत में सभी प्रतिभागी कैंसर से मुक्त थे। शोधकर्ताओं ने उनसे विस्तृत प्रश्नावली भरवाई जिसमें यह पूछा गया कि वे किन लोगों के साथ रहते हैं, परिवार या दोस्तों से कितनी बार मिलते हैं और अपने खाली समय में किस प्रकार की गतिविधियां करते हैं।

प्रश्नावली के विश्लेषण में पाया गया कि लगभग 15,942 प्रतिभागियों ने स्वीकार किया कि वे अक्सर अकेलापन महसूस करते हैं और उन्हें अपनी बात साझा करने के लिए बहुत कम लोग मिलते हैं। इन सभी प्रतिभागियों पर लगभग 12 वर्षों तक निगरानी रखी गई। इस अवधि के दौरान कुल 38,103 लोगों में कैंसर के मामले सामने आए। आंकड़ों के विश्लेषण से संकेत मिला कि सामाजिक अलगाव और अकेलेपन की स्थिति वाले लोगों में जोखिम अपेक्षाकृत अधिक था।

शोधकर्ताओं ने क्या कारण बताए

अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. जियाहाओ चेंग के अनुसार सामाजिक अलगाव और अकेलापन भले ही मनोवैज्ञानिक अनुभव हों, लेकिन इनका शरीर की जैविक प्रक्रियाओं पर भी प्रभाव पड़ता है। उनका कहना है कि लंबे समय तक अकेलेपन की स्थिति शरीर में लगातार तनाव की प्रतिक्रिया को सक्रिय कर सकती है।

इस तरह का क्रोनिक स्ट्रेस इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है और शरीर में सूजन यानी इन्फ्लेमेशन को बढ़ा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियां ट्यूमर के विकास के लिए अनुकूल माहौल बना सकती हैं। इसके अलावा हार्मोनल बदलाव भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभा सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि अकेले रहने वाले लोगों में कुछ अस्वस्थ आदतें ज्यादा देखी जाती हैं। इनमें धूम्रपान, असंतुलित खान-पान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और नियमित मेडिकल जांच से दूरी शामिल हैं। ये सभी कारक पहले से ही कैंसर के जोखिम से जुड़े माने जाते हैं।

विशेषज्ञों की सलाह और आगे की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि अकेलापन केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा भी बनता जा रहा है। इसलिए स्वास्थ्य नीतियों में सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े कारकों पर एक साथ ध्यान देना जरूरी है।

उनका मानना है कि यदि लोगों के सामाजिक संबंध मजबूत किए जाएं, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाया जाए और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाए तो कई गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है। इस दिशा में समुदाय स्तर पर पहल, परिवार और दोस्तों के साथ नियमित संपर्क तथा सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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