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MiddleEastCrisis – जानें क्या रंग लाएगी ईरान पर हमलों के बीच भारत की संतुलित चुप्पी…

MiddleEastCrisis – अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हमलों और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की प्रतिक्रिया को लेकर भी चर्चा हो रही है। अब तक भारत की ओर से कोई तीखा बयान सामने नहीं आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व से बातचीत की है, लेकिन ईरान के संदर्भ में आधिकारिक स्तर पर सीमित प्रतिक्रिया ही दिखी है। जानकारों का मानना है कि यह चुप्पी दरअसल एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

भारत की विदेश नीति में संतुलन की अहमियत

भू-रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि भारत इस समय बेहद जटिल वैश्विक परिस्थितियों का सामना कर रहा है। एक ओर अमेरिका और इजरायल के साथ उसके संबंध मजबूत हुए हैं, तो दूसरी ओर खाड़ी देशों में भारत के व्यापक आर्थिक और सामुदायिक हित जुड़े हैं। पश्चिम एशिया में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे मुद्दे भारत के लिए प्राथमिकता में हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना दीर्घकालिक हितों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बीते वर्षों में भारत ने इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ाया है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ व्यापार और निवेश के रिश्ते भी गहरे हुए हैं। इस पृष्ठभूमि में भारत की कोशिश यही है कि वह क्षेत्रीय तनाव के बीच संतुलित रुख बनाए रखे।

ईरान से रिश्ते और उनकी सीमाएं

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों का मानना है कि ईरान के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक रूप से सहयोगपूर्ण रहे हैं, लेकिन वे रूस जैसे ‘टाइम टेस्टेड’ रिश्तों की श्रेणी में नहीं आते। चाबहार बंदरगाह परियोजना और ऊर्जा सहयोग जैसे मुद्दों पर दोनों देशों ने साथ काम किया है, परंतु हाल के वर्षों में इन संबंधों की गति धीमी पड़ी है।

इसके अलावा, ईरान के शीर्ष नेतृत्व द्वारा समय-समय पर भारत के आंतरिक मामलों पर की गई टिप्पणियों को भी नई दिल्ली ने गंभीरता से लिया है। ऐसे में मौजूदा हालात में ईरान के समर्थन में खुलकर बयान देना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से सहज विकल्प नहीं माना जा रहा।

खाड़ी देशों में भारतीय समुदाय की भूमिका

भारत की चिंता का एक बड़ा पहलू खाड़ी देशों में रह रहे भारतीय नागरिक भी हैं। संयुक्त अरब अमीरात में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग काम करते हैं और वहां से होने वाला प्रेषण भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। ऊर्जा आपूर्ति के संदर्भ में भी खाड़ी क्षेत्र का महत्व कम नहीं है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है तो उसका सीधा असर तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार मार्गों और भारतीय समुदाय की सुरक्षा पर पड़ सकता है। ऐसे में भारत की प्राथमिकता क्षेत्र में स्थिरता और संवाद को बढ़ावा देना है, न कि किसी पक्ष में खड़ा होना।

संघर्ष पर भारत का आधिकारिक रुख

भारत ने अब तक औपचारिक रूप से यही कहा है कि क्षेत्र में शांति और संवाद आवश्यक है। विदेश नीति के स्तर पर यह स्पष्ट संकेत है कि भारत संघर्ष को बढ़ावा देने के बजाय कूटनीतिक समाधान का समर्थन करता है। अतीत में भी भारत ने अन्य देशों के आंतरिक मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी से परहेज किया है।

विश्लेषकों के मुताबिक, मौजूदा परिस्थिति में भारत की तटस्थता उसे भविष्य में मध्यस्थ या संतुलित साझेदार की भूमिका निभाने का अवसर भी दे सकती है। हालांकि वैश्विक राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं, इसलिए आने वाले दिनों में भारत की कूटनीतिक गतिविधियों पर नजर बनी रहेगी।

अंततः यह स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने सावधानी भरा रास्ता चुना है। यह रुख भले ही बाहरी तौर पर चुप्पी जैसा दिखे, लेकिन इसके पीछे व्यापक रणनीतिक गणना जुड़ी हुई मानी जा रही है।

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